ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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गुरुकुल-ऋषिकुल
नहीं हो सकती। इसलिये इस प्रकार भी यह बात स्वाभाविक है कि ब्रह्मचर्य-व्रत से इस चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति की जाय !
६—गुरुकुल-ऋषिकुल
“विद्यायाति गुरोः कुले ।”
( षुक् )
विद्यार्थी को गुरुकुल में विद्या की प्राप्ति होती है ।
“ऋषयो मन्त्र-द्वाराः ।”
ऋषि लोग हित की बात विचारने वाले थे, या संसार को शिखा देते थे ।
आर्य-सभ्यता के समय में हमारे इस देश में स्थान-स्थान पर गुरुकुल और ऋषिकुल थे । ‘गुरुकुल’ और ‘ऋषिकुल’—उस स्थान को कहते हैं, जहाँ गुरु या ऋषि का परिवार रहता था ।
वह गुरुकुल या ऋषिकुल उस स्थान पर रहता था, जो जल-वायु की दृष्टि से सर्वोत्तम ठहरता था । यह प्रायः हरे-भरे वनों या उर्वरा पान्दीय भूमि पर होता था । यहाँ नाना प्रकार के स्ना-स्थ्य कारक वृक्ष, फल और फूलों की अधिकता होती थी । भिन्न-भिन्न जाति के पशु और मनोहर शब्द करने वाले पक्षियों को आने जाने की पूर्ण स्वाधीनता रहती थी ।
इस एकान्त स्थान में गुरु या ऋषि लोग अपनी पत्नी और सन्तान सहित निवास करते थे । बहुत से ऐसे भी रहते थे, जिनके पास पत्नी और सन्तान नहीं रहती थी ।
गुरु ने लोगों होते थे, जो ब्रह्मचर्याश्रम और गृहस्थाश्रम का