भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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३. वैश्य

पशुनां रक्षणं दानं मिज्याध्ययनं मेवच । वशिष्कपथं कुत्सीदक्ष, वैश्यस्य क्विरेवच ॥

( मनुस्मृति )

पशुओं का संरक्षण, दान देना, यज्ञ करना, पढ़ना, व्यापार करना, और सूद लेना—ये वैश्य के कर्म हैं ।

४. शूद्र

एकमेव तु शूद्रस्य, प्रभुकर्मसमादिशत् । पतेपामेव वर्णानां, शुश्रूषा मनुसूयथा ॥

( मनुस्मृति )

शूद्र का एक ही कर्म निर्धारित किया गया है कि ऊपर कहे गये वर्णों की बहुत संयमशीलता से सेवा करते रहें ।

द्विजातियों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) को तो उपनयन, ब्रह्मचर्य और वेदाध्ययन का प्रत्यक्ष रूप से अधिकार है । तीनों वर्णों के कर्म भी ऐसे हैं, जो बिना ब्रह्मचर्य पालन किये कदापि नहीं चल सकते । अब रहे शूद्र, यदि वे भी ब्रह्मचर्य से न रहें तो उन्हें भी सेवा कार्य का सुचारु-रूप से निर्वाह करना परम कठिन है । क्योंकि योगिवर भर्तृहरि का कहना है कि सेवा-धर्म अत्यन्त कठिन है, उसका पालन करना योगियों को भी दुर्लभ होता है ।

मनुष्य-शरीर में भी प्रकृति से चारों वर्णों की व्यवस्था की है। ज्ञान, बल, ऐश्वर्य और सेवा-कार्य के बिना एक क्षण भी इसकी स्थिति