भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्ययुक्त वर्ण-व्यवस्था

१. ब्राह्मण

अध्यापन मध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रति ब्रह्महन्वेव, ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥

( मनुस्मृति )

पढ़ना, पढ़ाना, यह करना, यह कराना, दान देना और दान लेना—ये ब्राह्मण के कर्म हैं । ११

शमो दमस्तपः शौचं, शान्तिराजं मेवच । ज्ञानं विज्ञानमस्तिदयं, ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥

( श्रीमंगवद्वर्णाता )

मन की शान्ति, इन्द्रियों का दमन, जितेन्द्रियता, पवित्रता, च्छमा-शीलता, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता—ये ब्राह्मण के स्वाभाविक गुण हैं ।

२. क्षत्रिय

प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्वनमेवच । विपयेष्व प्रसक्तिश्च, क्षत्रियस्य समासतः ॥

( मनुस्मृति )

प्रजा-रक्षण, दान देना, यह करना, अध्ययन करना, जितेन्द्रिय रहना—ये क्षत्रियों के संक्षिप्त कर्म हैं ।

शौर्यं तेजो धृतिर्दक्ष्यं, युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च, ब्राह्म कर्म स्वभावजम् ॥

( श्रीमंगवद्वर्णाता )

शूरता, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध में दृढ़ता, दान, और आस्तिकता—ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ।