ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 149, कुल 380 में से
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२—एक स्थान पर न रह कर देशाटन करना । ३—अपने पवित्र विचारों से संसार का हित करना और दोषों को दूर करना । ४—अपने मन को शुद्ध रख कर आचरण करना । ५—काम, क्रोध, लोभ, मोहादि विकारों से दूर रहना । ६—न जीने की इच्छा और न मरने का भय करना । ७—सत्य बात कहना और कभी मिथ्या का आश्रय न लेना । ८—प्राणि-मात्र पर दया रखना और सुख-दुःख को समान मानना ।
५—तृष्णाशील, शान्त, आत्मचिन्तक और ब्रह्मज्ञ बनना । १०—योगाभ्यास और द्वैधर-स्मरण में अपना समय श्रियाना ।
५—ब्रह्मचर्ययुक्त वर्ण-व्यवस्था
“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं, गुण-कर्म-विभागशः ।”
( श्रीमद्भगवद्गीता )
चारों वर्णों की रचना, उनके गुण और कर्म के विभाग के अनुसार की गई है ।
ब्राह्मणोऽस्य सुखमास्तीदृ वाह्व राज्यन्यः कृतः ।
ऊरुतद्वस्थं यद् वैश्यः पद्भ्यो ५ शुद्धो अजायत ॥
( भगवद्गीता )
परम पुरुष के सुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, ऊरु से वैश्य और पग से शुद्ध उत्पन्न हुए हैं । सारांश यह कि ज्ञान, बल, धन और सेवा-प्रधान, मनुष्य-जाति के चार विभाग बनाये गये ।