भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 380 में से

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सन्ध्यासाश्रम

५—नाना प्रकार की विद्याओं और विद्यानों का आविष्कार करे ।

६—सर्वदा संयम और सदाचार से अपने शरीर को शुद्ध और आत्मा को उन्नत बनावे ।

७—व्रत और हवन से अपने हृदय और बुद्धि को शान्त और तीव्र बनावे ।

८—धर्म-कर्म का आदेश गृहस्थों को भी देता रहे ।

९—इन्द्रिय-दमन और योगाभ्यास को हृदय करे ।

१०—परमात्मा के ध्यान और चिन्तन में मन को रसाता रहे ।

(४) सन्ध्यासाश्रम

वनेषु च विहृत्यैव, तृतीयं भागमाशुषः ।

चतुर्थमाशुपोभागं, त्वयस्त्वासङ्गपरिव्रजते ॥

(धर्माचार्य मनु )

इस प्रकार आशुष्य का तीसरा भाग वनों में वित्त कर उस के चौथे भाग में ( ७५ से १०० तक ) सब प्रकार के सन्ध्याओं को त्याग कर सन्ध्यासी हो जाय ।

चौथे आश्रम का नाम सन्ध्यासाश्रम है । यह अश्वितम आश्रम है । इस में पहले कहे गये तीनों आश्रमों के कर्मों का भी त्याग हो जाता है । सन्ध्यास का अर्थ है—सम्पूर्ण रीति से त्याग ।

इस आश्रम के प्रधान कर्तव्यों का वर्णन नीचे किया जाता है—

१—शरीर-रक्षा के लिये अल्प तथा सात्विक आहार करना ।

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