भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 161

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

१५८

देकर के वेद-विद्या गुरु जब बिदा करेंगे। गुरु-दक्षिणा भी कुछ हम चरणों में ला धरेंगे ॥ कैसा परम मनोहर होगा अहो ! समय वह। आचार्य्य दैंगे मुझको करके रुपा अभय वह ॥ प्रेमाश्रु की सुधारा नयनों से वह चलेगी। गुरु से विमुक्त होते हस्तों को मति मलेगी ॥

६—आचार्य के दिव्योपदेश

“आचार्यो ब्रह्मचारी।”

(अथर्ववेद)

आचार्य ब्रह्मचारी (सदाचार का पालन करनेवाला) होता है, या यों कहिये कि आचार्य सद्ज्ञान का उपदेश देता है।

“वेद-श्रुतानादाचार्य, पितरं पत्निच्छति।”

(धर्मसूत्र मनु)

वेद-विद्याओं के पढ़ाने के कारण आचार्य पिता करके माना गया है।

बालक का विधि-विहित यज्ञोपवीत-संस्कार हो जाने पर उसके माता-पिता उसे गुरु-कुल में वेद पढ़ने के लिये प्रवृष्ट करा देते हैं। वहाँ वह अपने आचार्य को पिता मान कर उसकी संरक्षकता में समय व्यतीत करने लगता है। इस अवस्था में आचार्य उसके हित के लिये नाना प्रकार के दिव्य उपदेश देता है। इस कर्तव्य के सम्बन्ध में वेद-परक तैत्तिरीय उपनिषद् में इस प्रकार लिखा है:—