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ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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देकर के वेद-विद्या गुरु जब बिदा करेंगे। गुरु-दक्षिणा भी कुछ हम चरणों में ला धरेंगे ॥ कैसा परम मनोहर होगा अहो ! समय वह। आचार्य्य दैंगे मुझको करके रुपा अभय वह ॥ प्रेमाश्रु की सुधारा नयनों से वह चलेगी। गुरु से विमुक्त होते हस्तों को मति मलेगी ॥

६—आचार्य के दिव्योपदेश

“आचार्यो ब्रह्मचारी।”

(अथर्ववेद)

आचार्य ब्रह्मचारी (सदाचार का पालन करनेवाला) होता है, या यों कहिये कि आचार्य सद्ज्ञान का उपदेश देता है।

“वेद-श्रुतानादाचार्य, पितरं पत्निच्छति।”

(धर्मसूत्र मनु)

वेद-विद्याओं के पढ़ाने के कारण आचार्य पिता करके माना गया है।

बालक का विधि-विहित यज्ञोपवीत-संस्कार हो जाने पर उसके माता-पिता उसे गुरु-कुल में वेद पढ़ने के लिये प्रवृष्ट करा देते हैं। वहाँ वह अपने आचार्य को पिता मान कर उसकी संरक्षकता में समय व्यतीत करने लगता है। इस अवस्था में आचार्य उसके हित के लिये नाना प्रकार के दिव्य उपदेश देता है। इस कर्तव्य के सम्बन्ध में वेद-परक तैत्तिरीय उपनिषद् में इस प्रकार लिखा है:—

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आचार्य के दिव्योपदेश

वेदरतुल्याचार्योंऽमन्तेषादिनि मनुष्यास्तिः—

आचार्य अपने ऋद्धाचारी शिष्य को इस प्रकार शिक्षा देता हैः—

सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः ।

है पुत्र ! तू सत्य बोलना । धर्म पर चलना और स्वाध्याय (पाठ) में प्रमाद न करना ।

आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सी ।

पूर्ण ऋद्धाचर्य से जिद्याध्ययन के समाप्त होने पर आचार्य को दक्षिणा देकर, सन्तानोत्पत्ति के लिये गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना।

सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् ।

प्रमाद-वश होकर सत्य से विमुख न होना, प्रमाद के कारण धर्म को न त्याग देना और प्रमाद-युक्त हो कर सत्कर्म को न खो बैठना ।

भृत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् ।

अपने ऐश्वर्य की वृद्धि में प्रमाद न करना—अपने पठन-पाठन में असावधानता मत करना और देव तथा पितरों के कार्य से विरक्त न होना ।

मातृदेवो भव । पितु देवो भव । आचार्य देवो भव । अतिथि देवो भव ।

अपने माता-पिता, आचार्य तथा अतिथि का सत्कार करना । यान्यनवधानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि । जां कर्म दीप-रहित हों, उनका पालन करना । दुष्कर्मों का कभी नहीं !

यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्थानि नो इतराणि ।

मृगचर्य-विज्ञान

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जो हमारे अच्छे आचरण हों, उनका अनुकरण करना। कुचरियों का नहीं !

ये, के चासमच्छेया ५ सो ब्राह्मणस्तेषां त्वयासनेन प्रभव- सितव्यम् ।

जो लोग हममें उत्तम ब्राह्मणानी हैं, वन्हीं के सत्सङ्ग का विद्यास करना !

अन्द्रया देवम् । अश्रद्धया देवम् । श्रिया देवम् । ह्रिया देवम् । भिया देवम् । सविदा देवम् ।

अद्वा से देना—अश्रद्धा से देना—शोभा से देना—लज्जा से देना—और प्रतिष्ठा से दान देना चाहिये ।

अथ यदि ते कर्म विचिकित्सा वा वृत्त विचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्धिनो युक्ता अयुक्ता अलुक्ता धर्म कामाः स्तुर्यथा ते तत्र वर्त्तन्तः, तथा तत्र वत्तथाः ।

कभी कर्म या ज्ञान सम्बन्धी संशय उपरिथत हो, तो ऐसी अवस्था में ब्राह्मणानी, पक्षपात-रहित, योगी, अयोगी, दयावार और धर्म के प्रेमी वहाँ जैसा आचरण करते हों, वैसा ही आचरण करना योग्य है ।

एष आदेशः, एष उपदेशः, एषा वेदोपनिषद् । पतदनुशास- नम् । एवमुपासितव्यम् । एवमुचेतदुपास्यम् ।

यही आशा है, यही उपदेश है तथा यही वेद और उपनिषद् की शिक्षा है । यही करना चाहिये । इसी प्रकार के सदाचार का पालन कर्तव्य है ।

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पठन-पाठन के आदेश

१०---पठन-पाठन के आदेश

“पालनीया गुरोराद्या ।”

( सूक्ति )

गुरु की आज्ञा का पालन करना चाहिये ।

“सर्वेषां मेघदानानां, विद्यादानं विशिष्यते ।”

( भौति-शास्त्र )

सब प्रकार के दानों में विद्यादान श्रेष्ठ है ।

हमारे प्राचीन गुरुकुलों और ऋषिकुलों की पाठ-प्रणाली बड़ी सुखद थी । आज कल की भाँति अनेक प्रकार के प्रतिबन्ध नहीं थे । पढ़ने वाले और पढ़ाने वालों में परस्पर शिष्य और गुरु का सम्बन्ध था । एक पुत्र और दूसरा पिता के समान माना जाता था और इसी प्रकार का परस्पर व्यवहार भी किया जाता था । यही कारण है कि पठन-पाठन में विशेष असुविधा न थी ।

सैत्तिरीयोपनिषद् में विद्यार्थी और अध्यापक के लिये बड़े ही उत्तम आदेश किये गये हैं । उन्हें हम यहाँ उद्धृत करते हैं :—

ऋतस्त्र स्वाध्याय प्रवचने च । सत्यस्त्र स्वाध्याय प्रवचने च । तपस्त्र स्वाध्याय प्रवचने च । दमस्त्र स्वाध्याय प्रवचने च । शमस्त्र स्वाध्याय प्रवचने च । श्रद्धयस्त्र स्वाध्याय प्रवचने च ।

१—नियमबद्धता के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।

२—सत्य-भियता के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।

३—परिश्रम-शीलता के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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४—इन्द्रिय-दमन के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।

५—मनोनिग्रह के साथ विद्या को पढ़ाना और पढ़ाना चाहिये ।

६—विज्ञान-तर्क के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।

७—अभिहोत्र के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।

८—अतिथि-सत्कार के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।

९—मनुष्योचित व्यवहार के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।

१०—ज्ञान-सुधार के साथ पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।

११—ब्रह्मचर्य रक्षा के सहित विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।

१२—आश्रित-पालन के सहित विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।

ऊपर कहे गये आदेशों में १२ बालें पठन और पाठन के लिये प्रधान बतलाई गई हैं। इनके देखने से हमें प्राचीन-काल की विचारशीलता का भली भाँति बोध हो जाता है। ऐसी उच्च शिक्षा-प्रणाली की जितनी प्रशंसा की जाय, थोड़ी है ।

१—नियम-बद्धता २—सत्य-भ्रियता ३—परिश्रम-शीलता—इन तीनों के बिना विद्या पढ़ी और पढ़ाई नहीं जा सकती। शिष्य और गुरु दोनों को नियम-बद्ध, सत्य-भ्रिय और परिश्रमशील होना आवश्यक है ।

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गुरु-महिमा

४—इन्द्रिय-दमन ५—मनोनिग्रह ६—विज्ञान-तर्क—इन तीनों के साथ विद्या पढ़ने और पढ़ाने से वह फलवती होती है। इन्द्रिय-लोळुपता, चित्त की अनस्थिरता और अन्य विध्वंस से पढ़ी या पढ़ाई गई विद्या कभी किसी अर्थ की नहीं होती।

७—अग्नि-होत्र ८—अतिथि सत्कार ९—मनुष्योचित न्यव-हार—ये तीनों सत्कर्म्य हैं। विद्या पढ़ने या पढ़ाने का यही अभिप्राय है कि इन कर्मण्यों का विधिवत् पालन हो। शिष्य और गुरु दोनों के लिये ये अत्यन्त उपयोगी है।

१०—जन-सुधार ११—ब्रह्मचर्य और १२—आश्रितपालन—इन तीनों के बिना भी विद्या का पढ़ना-पढ़ाया व्यर्थ है। शिष्य और गुरु दोनों को जन-सुधारक, ब्रह्मचारी और आश्रित-पालक बनना योग्य है।

यही कारण था कि प्राचीन समय में हमारे देश में शिष्य और गुरुओं की विद्या सफल होती थी। वे लोग इन्हीं आदेशों को ध्यान में रख कर विद्या पढ़ते और पढ़ाते थे। यदि आजकल भी इन आदेशों पर चला जाय, तो ब्रह्मचर्य और विद्या का पुनः देश भर में निश्चय रूप से प्रचार और सुधार किया जा सकता है।

११—गुरु-महिमा

“आचार्यस्तत्तत्तनभस्ती उमेहेमे उर्वा गम्भीरे दृषिर्वा दिवञ्च ।” (अथर्ववेद)

आचार्य अत्यन्त गम्भीर, मौलिक और आध्यात्मिक ज्ञान, जिससे दोनों लोकों का सुधार होता है, अपने शिष्य को कराता है। “गुरुः साक्षात्पर ब्रह्म, तस्म श्रीयुत्पे नमः ।”

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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गुरु साक्षात् परमात्मा है। इसलिये उसे हमारा नमस्कार है। बालक का प्रथम जन्म माता-पिता से होता है और दूसरा जन्म आचार्य देता है। इसी कारण से सर्वत्र उसकी भूमि-भूमि प्रशंसा की गई है। ब्रह्मचर्य-सूक्त में ब्रह्मचारी के इस दूसरे जन्म का बड़ा उत्तम रूपक वर्णना गया है।

वास्तव में गुरु या आचार्य की महिमा अपार है। वह बालक को अहान-रूपी अन्यकार में, उपदेश रूपा प्रकाश देकर, स्वप्नदार्थों के दर्शन कराता है। उसके सदृश्यवहार, परम स्वार्थ-त्याग, कर्तव्य-निष्ठा, प्रगाढ़ परिश्रम, अनुपम अनुभव और सदाचार से ही ब्रह्मचारी का जीवन बनता है। यह वक्ति बहुत सत्य है कि जैसा गुरु होता है, उसका शिष्य भी वैसा ही बनता है।

संसार में शिक्षा का काम बड़ा महत्वशाली और छिट्टा समझ जाता है। इसके सभी लोग अधिकारी नहीं हो सकते। इसके लिये वक्ते अनुभव, ज्ञान, बुद्धिमत्ता, विद्वत्ता और संयमशीलता की आवश्यकता होती है। जिस पुरुष के हाथ में भावी लोक-सुधार का कार्य ही सौंपा गया हो, वह क्यों न सबसे-पूज्य तथा प्रसिद्धित हो ?

धर्मज्ञ मनु ने आचार्य की इस प्रकार अपने ग्रन्थ में परिभाषा-तथा उसके कर्म की प्रशंसा की है:—

उपनीय तु याः शिष्यं, वेदमध्यापयेद्बुद्धिजः। संकल्पं सरहस्थयज्ञं, तमाचार्यं प्रचक्षते ॥

जो बालक का यज्ञोपवीत करा कर यज्ञ-विधि, उपनिषद् तथा-वेदाङ्ग सहित-वेदों को पढ़ाता है, उसे आचार्य कहते हैं।

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आदर्श शिष्य

नानाविधानि कार्याणि कर्त्तुं-कारयित्वा च यः ।

सत्र धर्मं विधिश्चक्षु स आचार्य उच्यते ॥

नाना प्रकार के वैदिक कर्मों को करने और करानेवाला और सत्र प्रकार के यज्ञ-धर्म की विधि जाननेवाला आचार्य कहलाता है।

आचार्यस्त्वस्य यां जातिं, विधिबद्धेदपारगः ।

उत्पादयति साविद्या सा सत्या साऽजराऽमरा ॥

साझेपाक्ष वेद का ज्ञाता आचार्य जिस जाति को गायत्री-मन्त्र देकर उत्पन्न करता है, वह सत्य तथा अजर-अमर होती है।

१२—आदर्श शिष्य

“को वा गुरुर्स्तु हितोपदेशा ।

शिष्यस्तु को यो गुरु-भक्त एव ॥”

( शंकराचर्य )

गुरु कौन है ? जो हित का उपदेश करे । और शिष्य कौन है ? जो गुरु की आज्ञा माने ।

“गुरु-शुश्रूषया विद्या ।”

गुरु की सेवा से विद्यार्थी को ज्ञान प्राप्त होता है ।

गुरु-शिष्य का सम्बन्ध बड़ा घनिष्ठ होता है । पिता-पुत्र की उपमा भी इसके लिये कुछ अंशों में चरितार्थ हो सकती है । जो गुरु हित का उपदेशक नहीं है, उससे विद्यार्थी का वास्तविक लाभ कभी नहीं हो सकता । और उसी प्रकार जो शिष्य आज्ञाकारी नहीं है, उसे त्रिकाल में ज्ञान नहीं मिल सकता । इस बात की सत्यता नीचे के उदाहरण से प्रकट हो जायगी:—

ब्रह्मचर्य-विद्यान

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एक आचार्य के यहाँ एक ऋषिकुमार पढ़ता था। उसका नाम आरुणि था। एक दिन धान का खेत देखने के लिये उसके गुरु ने भेजा था। वहाँ डॉई कंट जाने के कारण पानी बाहर बह रहा था। वहाँ से उसके घर लौटने भर में खेत का सारा पानी निकल जाता और धान सूख जाता। यह विचार कर आरुणि स्वयं उसी में पड़ गया और इस प्रकार पानी रोके उसे दिन वहीं बीत गया। सन्ध्या समय गुरु को ध्यान आया कि क्या कारण कि आरुणि अभी तक घर नहीं लौटा। अवएव वे अपने दूसरे शिष्यों की लेकर उसे देखने गये। नाम लेकर पुकारने पर वह बोला कि गुरुजी मैं यहाँ पानी रोक कर पड़ा हूँ। जब सब लोग उसके पास पहुँच गये, तब उसने सारा समाचार कह सुनाया। लोगों ने मिल कर मेड़ बाँध दिया, तथा आरुणि के गुरु उससे अत्यन्त प्रसन्न हुये। गुरु की इस छपा और आशीर्वाद से आरुणि थोड़े ही दिनों में प्रकाण्ड परिषत्त हुआ।

एकलव्य नाम का एक वनचर था। उसके मन में अभिलाषा हुई कि द्रोणाचार्य से वायु-विद्या सीखें। पर आचार्य ने उसे नीच समझ कर विमुख फेर दिया। इस पर वह वन में जाकर द्रोणाचार्य की एक प्रस्तर की मूर्ति खड़ी कर, उसके सम्मुख बाण चलाता था। इस श्रद्धा और विश्वास से थोड़े ही दिनों में वह बालक बड़ा निपुण धनुर्धर निकल गया।

एक दिन वीरवर अर्जुन उस वन में गये। वहाँ इसकी वायु-विद्या के कौशल को देखकर उनके मन में बड़ा द्वेष उत्पन्न हुआ। उनके पुछने पर उसने अपने को द्रोणाचार्य का शिष्य बताया। यह बात जानकर अर्जुन को बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने आचार्य

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ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार

से जाकर कहा कि जो वाण-विद्या आपने एकलव्य को खिललाई है, वह मैं नहीं जानता। यह कैसी बात ?

अर्जुन का यह उपालम्ब द्वेषाचार्य के हृदय में लगा और इस बात की परीक्षा के लिये एकलव्य के पास गये। उससे इन्हें सब समाचार ज्ञात हुआ। इस पर आचार्य ने गुरु-दक्षिणा माँगी कि तुम अपने दाहिने हाथ का अँगूठा हमें दे दो। इस पर उसने अपने को धन्य समझ कर सहर्ष अँगूठा काट कर तत्काल प्रदान किया और आचार्य उसे आशीर्वाद देकर विदा हुये।

ऐसे ही सच्चे शिष्यों पर विद्या देवी की कृपा रहती है। इसी प्रकार के गुरुभक्त शिष्यों से देश, जाति और समाज का दुःख दूर हो सकता है।

१३—ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार

“न किञ्चिद्भयमागोति, ब्रह्मचर्यवते स्थितः।”

( श्लि )

ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित रहने से तनिक भी भय नहीं रहता।

“ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम्।”

ब्रह्मचर्य ही परम तप है।

छान्दोग्योपनिषद् में ब्रह्मचर्य का बहुत ही उत्तम वर्णन है। उसमें ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार बतलाये गये हैं। कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम। प्रत्येक प्रकार के लिये आयुष्य का एक नियमित काल निर्धारित किया गया है और बन्हीं मन्त्रों में उनसे होने वाले

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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लामों का भी उच्च वर्णन है। अतएव हम उन आबर्यक मन्त्रों को चनके अभिप्रायार्थ के साथ यहाँ उद्धृत करते हैं।

पुरुषो वाच यक्षत्स्य यानि चतुर्विंशति चर्पणि तत्मात सवर्नं, चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री गायनं प्रातः सवर्नं तदस्य वसचोऽन्वायत्ताः प्राणा वाच वसव पते हीद २ सवर्ं वासवन्ति।

तच्छ्रुदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेतस् ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातः सवर्नं माध्यं न्दंनं सवर्नमन्तु सन्तमुतेति माह प्राणानां वस्तूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्सुद्धैव तत् पत्यगदो ह भवति।

यह पुरुष अलरसमय देह और जीवात्मा के योग से बना है। यह स्वयं यज्ञ रूप है। इसका सत्कर्त्तव्य है कि जैसे २४ अक्षरों की गायत्री होती है और उस से कल्याण साधन होता है, उसी प्रकार यह भी २४ वर्ष पर्यन्त जितेन्द्रियज्ञ को धारण करे। इतने काल तक ब्रह्मचर्यपूर्वक बेदों का अभ्यास करे। उसके इस कार्य से उस के प्राण बलवान हो कर, सब दिव्य गुणों से युक्त हो जाते हैं। ब्रह्मचारी के आचार्य को चाहिये कि उसे इस पथ पर चलने का हितोपदेश करता रहे। ब्रह्मचारी भी अपने मन में यह धारणा करे कि इस व्रत के पालन से उसका अपना वीर्यवान और शरीर शक्तिमान् हो जायगा और उसके अन्तःकरण में सदगुणों का विकास होगा। हे मनुष्यों ! तुम सब सुखों के प्रकाश करने वाले ब्रह्मचय का लोप न होने दो।

“श्रथयानिचतुश्चतःविंशत्तवर्षाणि तन्माध्यन्दिनं सवर्नं चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप् वैष्टुभं माध्यन्दिनं सवर्नं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणाः वाच रुद्रा पते हीदं २ सवर्ं रोद्यन्ति।”

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ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार

“तं वेदस्मिन्मव्यसि किञ्चिदुपत पेत्स ब्रूयात्याणा रुद्रा इदमे माध्यन्दिनं सवर्नं तृतीयं सवर्नमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानां रुद्राणां मध्ये यच्चो विलोप्तीयेत्युद्देव तत पत्यगदोह भवति ।”

२—मध्यम ब्रह्मचर्य—जैसे ४४ अक्षरों का त्रिष्टुप्-छन्द होता है, वैसे ही जो पुरुष ४४ वर्षों तक ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करता है, उसके प्राण और सर्वज्ञ वलवार होकर दुर्गुणों का नाश करते हैं । यदि हम प्रथम वय में इस कहे हुए ब्रह्मचर्य का विधिवत् पालन करेंगे, तो हमारे प्राण रुद्र-रूप होकर, सज्जनों का कल्याण करेंगे । हे ब्रह्मचारियो ! जैसे हम इस ब्रह्मचर्य-व्रत का अनुष्ठान कर सुख स्वरूप और जनता के सेवक बनते हैं, ऐसे तुम भी बनो !

“अथ यांन्यष्टाच्चत्वारिंशद् वर्षाणि तत्तृतीयसवर्नमष्टाच्चत्वारिंशद्द्वारा जगतीजागतं तृतीयसवर्नं तदस्यादित्यान्यायत्ताः प्राणा वाचादित्या प्येहीद ५. सर्वभादृते ।”

“तं वेदेतस्मिन्मव्यसि किञ्चिदुपतपेत्स ब्रूयात्याणा आदित्या इदं मे तृतीयसवर्नमामनुसन्तनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्येयच्चो विलोप्तीयेत्युद्देव तत पत्यगदो हैव भवति ।”

३—और उत्तम ब्रह्मचर्य—जैसे ४८ अक्षरों का जगती-छन्द होता है, वैसे ही जो पुरुष इस प्रकार के ब्रह्मचर्य-व्रत का नियम-पूर्वक साधन करता है, उसके प्राण आदित्य रूप होकर सदुर्गुणों का प्रकाश करते हैं ।

यदि हमें प्रथम वय में इस कहे हुए ब्रह्मचर्य का यथोचित पालन करेंगे, तो हमारे प्राण आदित्य रूप होकर शरीर में ज्ञान का प्रकाश करेंगे । अतः हे ब्रह्मचारियो ! जिस प्रकार हम ब्रह्मचर्य

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ब्रह्मचर्य-विक्रान्त

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से रह कर दीर्घजीवी हो, संसार में विद्या की दृष्टि करते हैं, बसी प्रकार तुम भी करो ।

१४—मरुत् और साध्यपद्-ब्रह्मचारी

अथ यन्त्रतुर्यमसूतं तन्मरुत उपजीवन्ति लोमेन मुखेन । न वै देवा अमन्ति न पितृन्येतदेवासूतं दृष्ट्वा तृष्यन्ति ।

( छान्दोग्योपनिषत् )

जो पुरुष ४८ वर्ष से ऊपर के ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हैं, और चौथे वेद (अथर्व) का अध्ययन करते हैं, उन्हें 'मरुत् ब्रह्मचारी' कहते हैं। ऐसे ब्रह्मचारी का मुख चन्द्रमा की भाँति शोभित होता है और वे जो कुछ खाते या पीते हैं, उसमें कामना नहीं रखते। वे केवल अमृत-स्वरूप ब्रह्म ( परमात्मा ) का साक्षात्कार कर प्राप्त रहते हैं।

त एतदेवरूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्वापुःदुधन्ति ।

वे मरुत् नाम के ब्रह्मचारी इसी ब्रह्म का चारों ओर आभूषण करते और इसी की रूप से सर्वत्र कामचारी होते हैं।

अथ पञ्चममसूतं तत्तात्मा उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन । न वै देवा अमन्ति न पितृन्येतदेवासूतं दृष्ट्वा तृष्यन्ति ।

( छान्दोग्योपनिषत् )

जो पुरुष जीवन भर ब्रह्मचर्य में लीन रहते हैं, और साहो-पाह चारों ( ऋग्यजुसाम और अथर्व ) वेदों का अध्ययन करते हैं, 'साध्य-पद्-आम ब्रह्मचारी' कहलाते हैं। ऐसे ब्रह्मचारी का मुख-

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ब्रह्मचारी की भिन्ना

मण्डल ब्राह्म के समान तेजस्वी होता है और वे न तो कुछ खाते हैं, न पीते हैं, वरन् अमृतमय ब्राह्म में ही लीन होकर रहत होते हैं।

त पतदेवरूपमभिर्संचिशित्येतस्माद्वपादुचन्ति ।

वे साध्यपद प्राप्त ब्रह्मचारी इसी ब्रह्म (परमात्म) का सर्वत्र अनुभव करते हुये ज्ञान के प्रभाव से प्रकाशित होते हैं।

१५—ब्रह्मचारी की भिन्ना

“सायं प्रातश्चरैदुभैर्ज, भोज्यार्थं संयतेन्द्रियः।”

(महामान्य हारीत )

ब्रह्मचारी अपने भोजन के लिये सन्तोषपूर्वक सायं और प्रातःकाल भिन्ना माँगें।

“इमां भूमिं पृथिवीं ब्रह्मचारी भिन्नामाजभात प्रथमो दिवञ्च।”

(अथर्ववेद )

पहले पहल ब्रह्मचारी ने विरुत भौतिक ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान की भिन्ना माँगी।

गुरुकुल में रहने की अवस्था में ब्रह्मचारी अपने आचार्य का अन्न नहीं ग्रहण करता। वह स्वयं अपने गुरुपार्थ से अन्य स्थानों से भिन्ना माँग लाता है। इस भिन्ना का बड़ा महत्व है। इसे वह पहले पहल लाकर अपने आचार्य को समर्पित करता है। उसका आचार्य उसमें से जो कुछ दे देता है, उसे खाकर प्रखनतापूर्वक वह अपना जीवन व्यतीत करता है।

प्रचीन काल में प्रायः सब के पुत्र गुरुकुलों में पढ़ने जाते थे, और भिन्न-भिन्न घरों से भिन्ना माँगते थे। इस लिये सब घरों

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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कौ मातायें और बहिनें उत्तमोत्तम पदार्थ, जो ब्रह्मचारी द्वार पर आ जाता था, उसे दे देती थीं। वे यह समझती थीं कि इसी प्रकार हमारा पुत्र और भाई भी दूसरों के द्वार पर जाकर भिक्षा माँगाता होगा। अतएव इस प्रकार के सद्भाव से सभी ब्रह्मचारी सुखी रहते थे और उन्हें भिक्षा के लिये विशेष कष्ट नहीं करना पड़ता था। जो कुछ उन्हें प्राप्त हो जाता था, उसे ही लेकर चले जाते थे।

भिक्षा में मिली हुई सम्पूर्ण वस्तु गुरु को समर्पित कर देने का यह अभिप्राय था कि ब्रह्मचारी जिह्वा-लोलुपु न हो जाय। उस-के पास सब सामग्री रहने से वह अधिक भोजन कर जायगा और इससे रोग उत्पन्न होगा तथा उसके विद्याध्ययन में वित्र पड़ेगा। वह स्वार्थी बन जायगा और भोजन को ही सब कुछ समझ बैठेगा। इससे ब्रह्मचर्य-व्रत में हानि हो जायगी।

अब हम भिक्षा के सम्बन्ध में ब्रह्मचारी के लिये उपयोगी नियमों का वर्णन करते हैं:—

१—बेदज्ञ, यज्ञकर्त्ता और धर्मात्मा पुरुषों के घर से सदा भिक्षा लाना योग्य है। इस लिये कि सज्जनों के यहाँ से पवित्र और सात्विक पदार्थ ही दिया जाता है, जिससे स्वास्थ्थ और मन पर सुखा प्रभाव नहीं पड़ता।

२—आचार्य कुल सजाति और सम्बन्धियों के यहाँ से भिक्षा न लानी चाहिये। इसलिये कि इन स्थानों में जाने से सङ्कीर्ण होता है, जान-पहचान के कारण विशेष समय नष्ट होता है तथा अपमान का भी भय रहता है।

३—नीरोग रहने की दशा में एक सप्ताह तक भिक्षा माँगने

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ब्रह्मचारी के तीन प्रकार

न जाने से ब्रह्मचारी की प्रायश्चित रूप में 'अवकीर्ण ब्रत' करना पड़ता है। यह इसलिये कि असावधानी, प्रमाद और आलस्य उसमें न आने पावे।

४—एक ही घर का अन्न न लेकर, भिन्न-भिन्न घरों से भिन्ना ग्रहण करना उचित है। इसका अभिप्राय यह है कि एक ही गृहस्थ पर अधिक भार न पड़े, जिससे कि उसकी भिन्ना देने की श्रद्धा घट जाय।

“—दुष्ट, पातकी और अभिमानी के घर से भिन्ना लेने की अपेक्षा निराहार भर जाना भी उचित है। यह इसलिये कि अवमियों का अन्न अपवित्र तथा अशुभद्वय होता है। उसके ग्रहण करने से दुष्टि नष्ट हो जाती है और रोग उत्पन्न करता है, जिससे ब्रह्मचर्य-ब्रत खण्डित होने का भय रहता है।

१६—ब्रह्मचारी के तीन प्रकार

“ब्रह्मचारी ण्णंश्चरति रोदसी इमे।”

( अथर्ववेद )

ब्रह्मचारी भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के ज्ञान का अर्जन करके प्रचार करता है।

“ब्रह्म ब्रह्मचारिभि बद्धकामत् ।”

ब्रह्मचारी से ही ब्रह्मज्ञान का प्रकाश होता है।

छान्दोग्योपनिषद् में महत्व की दृष्टि से ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार माने गये हैं। कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम। पहले में २४ वर्ष, दूसरे में ४४ वर्ष और तीसरे में ४८ वर्षों का विधान है।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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इस भाँति ब्रह्मचारी भी तीन प्रकार के होते हैं । कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम ।

कनिष्ठ ब्रह्मचर्य के सिद्ध होने पर ब्रह्मचारी की वसु संज्ञा होती है । 'वसु ब्रह्मचारी' के कहे जाने का अभिप्राय यह है कि २४ वर्ष के ब्रह्मचर्य से वह परम ऐश्वर्यशाली हो जाता है । मध्यम ब्रह्मचर्य के सिद्ध होने पर ब्रह्मचारी की रुद्र संज्ञा होती है । 'रुद्र ब्रह्मचारी' कहने का तात्पर्य यह है कि ४४ वर्ष के ब्रह्मचर्य से अत्यन्त पराक्रम प्राप्त होता है । और उत्तम ब्रह्मचर्य के सिद्ध होने पर ब्रह्मचारी की आदित्य संज्ञा होती है । 'आदित्य ब्रह्मचारी' कहने का आशय यह है कि ४८ वर्ष के ब्रह्मचर्य से वह उत्कट तेजस्वी हो जाता है ।

वसु ब्रह्मचारी को ऐश्वर्य, रुद्र ब्रह्मचारी को ऐश्वर्य और पराक्रम और आदित्य ब्रह्मचारी को ऐश्वर्य, पराक्रम तथा तेज—तीनों प्राप्त होते हैं । वैश्य को वसु, क्षत्रिय को रुद्र और ब्राह्मण को आदित्य ब्रह्मचारी बनाना चाहिये ।

वसु ब्रह्मचारी के सुख पर इन्द्र की सी कान्ति, रुद्र ब्रह्मचारी के सुख पर महादेव की सी गुरुता और आदित्य ब्रह्मचारी के सुख पर सूर्य की सी व्योतिः होती है ।

इस समय जनता में एक भी ऊपर कहे गये तीन प्रकार के ब्रह्मचारियों में से नहीं दिखाई पड़ता । भारतवर्ष के अधःपतन का इससे भी अनुमान लगाया जा सकता है । यदि पुनः प्राचीन ब्रह्मचर्य-प्रणाली का प्रचार हो जाय, तो आर्य-जाति के उद्धार में रक्षमात्र सन्देह नहीं ।

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ब्रह्मचारी के वर्जित कर्म

१७-ब्रह्मचारी के वर्जित कर्म

“गर्भो भूत्वाऽमृतस्ययोना विन्द्रो ह भूत्वाऽसुरास्ततर्है ।” (अथर्ववेद)

ब्रह्मचारी ज्ञान के केन्द्रस्थान से बाहर निकला। अब वह एकट विद्वान होकर दुर्गुणों का दृढ़ता से संहार करने लगा।

“तत्रास्य माता सावित्री, पिता त्वाचार्य उच्यते ।”

(मनुस्मृति)

गुरुकुल में शावित्री ब्रह्मचारी की माता और आचार्य पिता कहलाता है।

ब्रह्मचर्याश्रम का पालन करना सरल काम नहीं। एक भी असावधानी होने से अनेक विघ्न खड़े हो जाते हैं। ब्रह्मचारी को वड़े आचार-विचार से रहना पड़ता है। इस लिये विद्वान ऋषियों ने संयम और सदाचार से रहने का शास्त्रों में विधान किया है।

अब हम उन वर्जित कर्मों का वर्णन करते हैं, जिनके करने से ब्रह्मचारी पवित्र, उसका आत्मा निस्तेज और व्रत भङ्ग हो जाता है:—

वज्रैर्येनमुर्मासञ्च, गर्भं माल्यं तथा लियः।

शुकानि यानि सर्वाणि, प्राणिनाञ्चैव हिंसनम् ॥

मधु और मांस न खाय—पुष्पों की माला न पहने—सुगन्धित द्रव्य का व्यवहार न करे—सरस भोजन न करे—लियों में न रमे—सिरका आदि न खाय और जीवों को न मारे।

श्रम्यङ्गमञ्जनं चाक्षुषीरुपानच्छत्र धारयाम्।

कामं क्रोधञ्च लोभञ्च, नर्त्तनं गीतवादनम् ॥

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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शरीर में तैल लगाना, आँखों में अखन देना, जूता और छाता धारण करना, काम, क्रोध, लोभ तथा गाना-बजाना वर्जित है।

यृतश्च जनवादश्च, परिवार्द तथाऽनूतम् ।

खीणाञ्च मेक्षणात्मममुपघातं परस्य च ॥

जुआ खेलना, किन्वदन्ती उड़ाना, निन्दा करना, असत्य बोलना, स्त्रियों को निहारना, और अङ्ग लगाना तथा दूसरे का अपकार करना मना है ।

हस्त्यश्वारोहरणं चैव, सन्त्यनेत्संजितेन्द्रियः ।

ब्रह्मचारी हाथी और घोड़े आदि सवारी पर न चढ़े ।

माना स्वस्वा दुहित्रा वा, न विविकान्तो भवेत् ।

बलवान्निन्द्रियश्रामो, विद्वांसमपि कर्पसि ॥

माता, बहन वा पुत्री किसी के साथ एकान्त में न बैठना चाहिये । क्योंकि इन्द्रियों का समूह बड़ा बलवान होता है, वह विद्वानों को भी अपनी ओर खींच ले जाता है ।

एकः शयीत सर्वत्र, न रेतस्कन्दयेत्कचित् ।

कामाद्विरस्कन्द्यत्र रेतो, हिनस्ति व्रतमात्मनः ॥

सर्वत्र अकेला सोवे । अपना वीर्य कभी कहीं स्खलित न होने दे । इच्छा से वीर्य का नाश करने से ब्रह्मचारी का व्रत नष्ट हो जाता है ।

उपयुक्त वालों के असिरिक भी ब्रह्मचारी के लिये बहुत से वर्जित कर्म हैं—

गुरु की आज्ञा बिना बैठना—उनके सामने उल्लूचासन पर बैठे रहना—उनके परोच में बिना आदर युक्त नाम लेकर उनका परिचय देना—उनकी निन्दा सुनना—उनके दोषों को कहना—

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ब्रह्मचारी के कर्तव्य कर्म

जैसे दूर रहना—खियों के समागम में बैठना—शुक्ती गुरु-पत्नी के चरण. हृफर प्रणाम तथा श्रृंगार करना एवं अभ्ययन में आलस्य करना आदि वर्जित है।

काम क्रोध तथा लोभ, स्वादुश्रृंगार कौतुके।

अति निद्रातिसेवे च, विद्यार्थी छाप वर्जयेत् ॥

( चाणक्य-नाति )

काम, क्रोध, लोभ, खाद, श्रृङ्गार, कौतुक, अति निद्रा और अति सेवा—ये आठ कर्म विद्यार्थी के लिये वर्जित हैं।

सुखार्थी चैत्यजेष्टिषां, विद्यार्थी चैत्यजेस्तुषम्।

सुखार्थिनः कुतो विद्या, सुखं विद्यार्थिनः कुतः ॥

( विदुरनाति )

सुख चाहने वाला विद्या के और विद्या का प्रेमी सुख को छोड़ दें। क्योंकि सुखार्थी को विद्या नहीं आती और विद्यार्थी को सुख नहीं मिलता।

आलस्यं मद् मोहो च, चापस्यं गोष्ठिरेव च।

स्तेन्द्यता चाभिमानित्वं, तथाऽत्यागित्वमेव च ॥

(बहुर्ननाति)

आलस्य, मद, मोह, चपलता, व्यर्थ बात चीत करना, जुप रहना, अभिमान करना और स्वार्थी होना—ये सात अवगुण विद्यार्थियों के माने गये हैं।

१८—ब्रह्मचारी के कर्तव्य कर्म

“श्रुत्योरहं ब्रह्मचारी यदस्मिन्निर्थाचन् भूतापुत्रं यमाय।” ( अथर्ववेद )