ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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आदर्श शिष्य
नानाविधानि कार्याणि कर्त्तुं-कारयित्वा च यः ।
सत्र धर्मं विधिश्चक्षु स आचार्य उच्यते ॥
नाना प्रकार के वैदिक कर्मों को करने और करानेवाला और सत्र प्रकार के यज्ञ-धर्म की विधि जाननेवाला आचार्य कहलाता है।
आचार्यस्त्वस्य यां जातिं, विधिबद्धेदपारगः ।
उत्पादयति साविद्या सा सत्या साऽजराऽमरा ॥
साझेपाक्ष वेद का ज्ञाता आचार्य जिस जाति को गायत्री-मन्त्र देकर उत्पन्न करता है, वह सत्य तथा अजर-अमर होती है।
१२—आदर्श शिष्य
“को वा गुरुर्स्तु हितोपदेशा ।
शिष्यस्तु को यो गुरु-भक्त एव ॥”
( शंकराचर्य )
गुरु कौन है ? जो हित का उपदेश करे । और शिष्य कौन है ? जो गुरु की आज्ञा माने ।
“गुरु-शुश्रूषया विद्या ।”
गुरु की सेवा से विद्यार्थी को ज्ञान प्राप्त होता है ।
गुरु-शिष्य का सम्बन्ध बड़ा घनिष्ठ होता है । पिता-पुत्र की उपमा भी इसके लिये कुछ अंशों में चरितार्थ हो सकती है । जो गुरु हित का उपदेशक नहीं है, उससे विद्यार्थी का वास्तविक लाभ कभी नहीं हो सकता । और उसी प्रकार जो शिष्य आज्ञाकारी नहीं है, उसे त्रिकाल में ज्ञान नहीं मिल सकता । इस बात की सत्यता नीचे के उदाहरण से प्रकट हो जायगी:—