ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 380 में से
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गुरु साक्षात् परमात्मा है। इसलिये उसे हमारा नमस्कार है। बालक का प्रथम जन्म माता-पिता से होता है और दूसरा जन्म आचार्य देता है। इसी कारण से सर्वत्र उसकी भूमि-भूमि प्रशंसा की गई है। ब्रह्मचर्य-सूक्त में ब्रह्मचारी के इस दूसरे जन्म का बड़ा उत्तम रूपक वर्णना गया है।
वास्तव में गुरु या आचार्य की महिमा अपार है। वह बालक को अहान-रूपी अन्यकार में, उपदेश रूपा प्रकाश देकर, स्वप्नदार्थों के दर्शन कराता है। उसके सदृश्यवहार, परम स्वार्थ-त्याग, कर्तव्य-निष्ठा, प्रगाढ़ परिश्रम, अनुपम अनुभव और सदाचार से ही ब्रह्मचारी का जीवन बनता है। यह वक्ति बहुत सत्य है कि जैसा गुरु होता है, उसका शिष्य भी वैसा ही बनता है।
संसार में शिक्षा का काम बड़ा महत्वशाली और छिट्टा समझ जाता है। इसके सभी लोग अधिकारी नहीं हो सकते। इसके लिये वक्ते अनुभव, ज्ञान, बुद्धिमत्ता, विद्वत्ता और संयमशीलता की आवश्यकता होती है। जिस पुरुष के हाथ में भावी लोक-सुधार का कार्य ही सौंपा गया हो, वह क्यों न सबसे-पूज्य तथा प्रसिद्धित हो ?
धर्मज्ञ मनु ने आचार्य की इस प्रकार अपने ग्रन्थ में परिभाषा-तथा उसके कर्म की प्रशंसा की है:—
उपनीय तु याः शिष्यं, वेदमध्यापयेद्बुद्धिजः। संकल्पं सरहस्थयज्ञं, तमाचार्यं प्रचक्षते ॥
जो बालक का यज्ञोपवीत करा कर यज्ञ-विधि, उपनिषद् तथा-वेदाङ्ग सहित-वेदों को पढ़ाता है, उसे आचार्य कहते हैं।