भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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गुरु-महिमा

४—इन्द्रिय-दमन ५—मनोनिग्रह ६—विज्ञान-तर्क—इन तीनों के साथ विद्या पढ़ने और पढ़ाने से वह फलवती होती है। इन्द्रिय-लोळुपता, चित्त की अनस्थिरता और अन्य विध्वंस से पढ़ी या पढ़ाई गई विद्या कभी किसी अर्थ की नहीं होती।

७—अग्नि-होत्र ८—अतिथि सत्कार ९—मनुष्योचित न्यव-हार—ये तीनों सत्कर्म्य हैं। विद्या पढ़ने या पढ़ाने का यही अभिप्राय है कि इन कर्मण्यों का विधिवत् पालन हो। शिष्य और गुरु दोनों के लिये ये अत्यन्त उपयोगी है।

१०—जन-सुधार ११—ब्रह्मचर्य और १२—आश्रितपालन—इन तीनों के बिना भी विद्या का पढ़ना-पढ़ाया व्यर्थ है। शिष्य और गुरु दोनों को जन-सुधारक, ब्रह्मचारी और आश्रित-पालक बनना योग्य है।

यही कारण था कि प्राचीन समय में हमारे देश में शिष्य और गुरुओं की विद्या सफल होती थी। वे लोग इन्हीं आदेशों को ध्यान में रख कर विद्या पढ़ते और पढ़ाते थे। यदि आजकल भी इन आदेशों पर चला जाय, तो ब्रह्मचर्य और विद्या का पुनः देश भर में निश्चय रूप से प्रचार और सुधार किया जा सकता है।

११—गुरु-महिमा

“आचार्यस्तत्तत्तनभस्ती उमेहेमे उर्वा गम्भीरे दृषिर्वा दिवञ्च ।” (अथर्ववेद)

आचार्य अत्यन्त गम्भीर, मौलिक और आध्यात्मिक ज्ञान, जिससे दोनों लोकों का सुधार होता है, अपने शिष्य को कराता है। “गुरुः साक्षात्पर ब्रह्म, तस्म श्रीयुत्पे नमः ।”