ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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४—इन्द्रिय-दमन के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
५—मनोनिग्रह के साथ विद्या को पढ़ाना और पढ़ाना चाहिये ।
६—विज्ञान-तर्क के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
७—अभिहोत्र के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
८—अतिथि-सत्कार के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
९—मनुष्योचित व्यवहार के साथ विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
१०—ज्ञान-सुधार के साथ पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
११—ब्रह्मचर्य रक्षा के सहित विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
१२—आश्रित-पालन के सहित विद्या को पढ़ना और पढ़ाना चाहिये ।
ऊपर कहे गये आदेशों में १२ बालें पठन और पाठन के लिये प्रधान बतलाई गई हैं। इनके देखने से हमें प्राचीन-काल की विचारशीलता का भली भाँति बोध हो जाता है। ऐसी उच्च शिक्षा-प्रणाली की जितनी प्रशंसा की जाय, थोड़ी है ।
१—नियम-बद्धता २—सत्य-भ्रियता ३—परिश्रम-शीलता—इन तीनों के बिना विद्या पढ़ी और पढ़ाई नहीं जा सकती। शिष्य और गुरु दोनों को नियम-बद्ध, सत्य-भ्रिय और परिश्रमशील होना आवश्यक है ।