ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विद्यान
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एक आचार्य के यहाँ एक ऋषिकुमार पढ़ता था। उसका नाम आरुणि था। एक दिन धान का खेत देखने के लिये उसके गुरु ने भेजा था। वहाँ डॉई कंट जाने के कारण पानी बाहर बह रहा था। वहाँ से उसके घर लौटने भर में खेत का सारा पानी निकल जाता और धान सूख जाता। यह विचार कर आरुणि स्वयं उसी में पड़ गया और इस प्रकार पानी रोके उसे दिन वहीं बीत गया। सन्ध्या समय गुरु को ध्यान आया कि क्या कारण कि आरुणि अभी तक घर नहीं लौटा। अवएव वे अपने दूसरे शिष्यों की लेकर उसे देखने गये। नाम लेकर पुकारने पर वह बोला कि गुरुजी मैं यहाँ पानी रोक कर पड़ा हूँ। जब सब लोग उसके पास पहुँच गये, तब उसने सारा समाचार कह सुनाया। लोगों ने मिल कर मेड़ बाँध दिया, तथा आरुणि के गुरु उससे अत्यन्त प्रसन्न हुये। गुरु की इस छपा और आशीर्वाद से आरुणि थोड़े ही दिनों में प्रकाण्ड परिषत्त हुआ।
एकलव्य नाम का एक वनचर था। उसके मन में अभिलाषा हुई कि द्रोणाचार्य से वायु-विद्या सीखें। पर आचार्य ने उसे नीच समझ कर विमुख फेर दिया। इस पर वह वन में जाकर द्रोणाचार्य की एक प्रस्तर की मूर्ति खड़ी कर, उसके सम्मुख बाण चलाता था। इस श्रद्धा और विश्वास से थोड़े ही दिनों में वह बालक बड़ा निपुण धनुर्धर निकल गया।
एक दिन वीरवर अर्जुन उस वन में गये। वहाँ इसकी वायु-विद्या के कौशल को देखकर उनके मन में बड़ा द्वेष उत्पन्न हुआ। उनके पुछने पर उसने अपने को द्रोणाचार्य का शिष्य बताया। यह बात जानकर अर्जुन को बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने आचार्य