ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार
से जाकर कहा कि जो वाण-विद्या आपने एकलव्य को खिललाई है, वह मैं नहीं जानता। यह कैसी बात ?
अर्जुन का यह उपालम्ब द्वेषाचार्य के हृदय में लगा और इस बात की परीक्षा के लिये एकलव्य के पास गये। उससे इन्हें सब समाचार ज्ञात हुआ। इस पर आचार्य ने गुरु-दक्षिणा माँगी कि तुम अपने दाहिने हाथ का अँगूठा हमें दे दो। इस पर उसने अपने को धन्य समझ कर सहर्ष अँगूठा काट कर तत्काल प्रदान किया और आचार्य उसे आशीर्वाद देकर विदा हुये।
ऐसे ही सच्चे शिष्यों पर विद्या देवी की कृपा रहती है। इसी प्रकार के गुरुभक्त शिष्यों से देश, जाति और समाज का दुःख दूर हो सकता है।
१३—ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार
“न किञ्चिद्भयमागोति, ब्रह्मचर्यवते स्थितः।”
( श्लि )
ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित रहने से तनिक भी भय नहीं रहता।
“ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम्।”
ब्रह्मचर्य ही परम तप है।
छान्दोग्योपनिषद् में ब्रह्मचर्य का बहुत ही उत्तम वर्णन है। उसमें ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार बतलाये गये हैं। कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम। प्रत्येक प्रकार के लिये आयुष्य का एक नियमित काल निर्धारित किया गया है और बन्हीं मन्त्रों में उनसे होने वाले