भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 380 में से

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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लामों का भी उच्च वर्णन है। अतएव हम उन आबर्यक मन्त्रों को चनके अभिप्रायार्थ के साथ यहाँ उद्धृत करते हैं।

पुरुषो वाच यक्षत्स्य यानि चतुर्विंशति चर्पणि तत्मात सवर्नं, चतुर्विंशत्यक्षरा गायत्री गायनं प्रातः सवर्नं तदस्य वसचोऽन्वायत्ताः प्राणा वाच वसव पते हीद २ सवर्ं वासवन्ति।

तच्छ्रुदेतस्मिन् वयसि किञ्चिदुपतपेतस् ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातः सवर्नं माध्यं न्दंनं सवर्नमन्तु सन्तमुतेति माह प्राणानां वस्तूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्सुद्धैव तत् पत्यगदो ह भवति।

यह पुरुष अलरसमय देह और जीवात्मा के योग से बना है। यह स्वयं यज्ञ रूप है। इसका सत्कर्त्तव्य है कि जैसे २४ अक्षरों की गायत्री होती है और उस से कल्याण साधन होता है, उसी प्रकार यह भी २४ वर्ष पर्यन्त जितेन्द्रियज्ञ को धारण करे। इतने काल तक ब्रह्मचर्यपूर्वक बेदों का अभ्यास करे। उसके इस कार्य से उस के प्राण बलवान हो कर, सब दिव्य गुणों से युक्त हो जाते हैं। ब्रह्मचारी के आचार्य को चाहिये कि उसे इस पथ पर चलने का हितोपदेश करता रहे। ब्रह्मचारी भी अपने मन में यह धारणा करे कि इस व्रत के पालन से उसका अपना वीर्यवान और शरीर शक्तिमान् हो जायगा और उसके अन्तःकरण में सदगुणों का विकास होगा। हे मनुष्यों ! तुम सब सुखों के प्रकाश करने वाले ब्रह्मचय का लोप न होने दो।

“श्रथयानिचतुश्चतःविंशत्तवर्षाणि तन्माध्यन्दिनं सवर्नं चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप् वैष्टुभं माध्यन्दिनं सवर्नं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणाः वाच रुद्रा पते हीदं २ सवर्ं रोद्यन्ति।”

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