ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार
“तं वेदस्मिन्मव्यसि किञ्चिदुपत पेत्स ब्रूयात्याणा रुद्रा इदमे माध्यन्दिनं सवर्नं तृतीयं सवर्नमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानां रुद्राणां मध्ये यच्चो विलोप्तीयेत्युद्देव तत पत्यगदोह भवति ।”
२—मध्यम ब्रह्मचर्य—जैसे ४४ अक्षरों का त्रिष्टुप्-छन्द होता है, वैसे ही जो पुरुष ४४ वर्षों तक ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करता है, उसके प्राण और सर्वज्ञ वलवार होकर दुर्गुणों का नाश करते हैं । यदि हम प्रथम वय में इस कहे हुए ब्रह्मचर्य का विधिवत् पालन करेंगे, तो हमारे प्राण रुद्र-रूप होकर, सज्जनों का कल्याण करेंगे । हे ब्रह्मचारियो ! जैसे हम इस ब्रह्मचर्य-व्रत का अनुष्ठान कर सुख स्वरूप और जनता के सेवक बनते हैं, ऐसे तुम भी बनो !
“अथ यांन्यष्टाच्चत्वारिंशद् वर्षाणि तत्तृतीयसवर्नमष्टाच्चत्वारिंशद्द्वारा जगतीजागतं तृतीयसवर्नं तदस्यादित्यान्यायत्ताः प्राणा वाचादित्या प्येहीद ५. सर्वभादृते ।”
“तं वेदेतस्मिन्मव्यसि किञ्चिदुपतपेत्स ब्रूयात्याणा आदित्या इदं मे तृतीयसवर्नमामनुसन्तनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्येयच्चो विलोप्तीयेत्युद्देव तत पत्यगदो हैव भवति ।”
३—और उत्तम ब्रह्मचर्य—जैसे ४८ अक्षरों का जगती-छन्द होता है, वैसे ही जो पुरुष इस प्रकार के ब्रह्मचर्य-व्रत का नियम-पूर्वक साधन करता है, उसके प्राण आदित्य रूप होकर सदुर्गुणों का प्रकाश करते हैं ।
यदि हमें प्रथम वय में इस कहे हुए ब्रह्मचर्य का यथोचित पालन करेंगे, तो हमारे प्राण आदित्य रूप होकर शरीर में ज्ञान का प्रकाश करेंगे । अतः हे ब्रह्मचारियो ! जिस प्रकार हम ब्रह्मचर्य
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