भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विक्रान्त

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से रह कर दीर्घजीवी हो, संसार में विद्या की दृष्टि करते हैं, बसी प्रकार तुम भी करो ।

१४—मरुत् और साध्यपद्-ब्रह्मचारी

अथ यन्त्रतुर्यमसूतं तन्मरुत उपजीवन्ति लोमेन मुखेन । न वै देवा अमन्ति न पितृन्येतदेवासूतं दृष्ट्वा तृष्यन्ति ।

( छान्दोग्योपनिषत् )

जो पुरुष ४८ वर्ष से ऊपर के ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हैं, और चौथे वेद (अथर्व) का अध्ययन करते हैं, उन्हें 'मरुत् ब्रह्मचारी' कहते हैं। ऐसे ब्रह्मचारी का मुख चन्द्रमा की भाँति शोभित होता है और वे जो कुछ खाते या पीते हैं, उसमें कामना नहीं रखते। वे केवल अमृत-स्वरूप ब्रह्म ( परमात्मा ) का साक्षात्कार कर प्राप्त रहते हैं।

त एतदेवरूपमभिसंविशन्त्येतस्माद्वापुःदुधन्ति ।

वे मरुत् नाम के ब्रह्मचारी इसी ब्रह्म का चारों ओर आभूषण करते और इसी की रूप से सर्वत्र कामचारी होते हैं।

अथ पञ्चममसूतं तत्तात्मा उपजीवन्ति ब्रह्मणा मुखेन । न वै देवा अमन्ति न पितृन्येतदेवासूतं दृष्ट्वा तृष्यन्ति ।

( छान्दोग्योपनिषत् )

जो पुरुष जीवन भर ब्रह्मचर्य में लीन रहते हैं, और साहो-पाह चारों ( ऋग्यजुसाम और अथर्व ) वेदों का अध्ययन करते हैं, 'साध्य-पद्-आम ब्रह्मचारी' कहलाते हैं। ऐसे ब्रह्मचारी का मुख-