भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचारी की भिन्ना

मण्डल ब्राह्म के समान तेजस्वी होता है और वे न तो कुछ खाते हैं, न पीते हैं, वरन् अमृतमय ब्राह्म में ही लीन होकर रहत होते हैं।

त पतदेवरूपमभिर्संचिशित्येतस्माद्वपादुचन्ति ।

वे साध्यपद प्राप्त ब्रह्मचारी इसी ब्रह्म (परमात्म) का सर्वत्र अनुभव करते हुये ज्ञान के प्रभाव से प्रकाशित होते हैं।

१५—ब्रह्मचारी की भिन्ना

“सायं प्रातश्चरैदुभैर्ज, भोज्यार्थं संयतेन्द्रियः।”

(महामान्य हारीत )

ब्रह्मचारी अपने भोजन के लिये सन्तोषपूर्वक सायं और प्रातःकाल भिन्ना माँगें।

“इमां भूमिं पृथिवीं ब्रह्मचारी भिन्नामाजभात प्रथमो दिवञ्च।”

(अथर्ववेद )

पहले पहल ब्रह्मचारी ने विरुत भौतिक ज्ञान और आध्यात्मिक ज्ञान की भिन्ना माँगी।

गुरुकुल में रहने की अवस्था में ब्रह्मचारी अपने आचार्य का अन्न नहीं ग्रहण करता। वह स्वयं अपने गुरुपार्थ से अन्य स्थानों से भिन्ना माँग लाता है। इस भिन्ना का बड़ा महत्व है। इसे वह पहले पहल लाकर अपने आचार्य को समर्पित करता है। उसका आचार्य उसमें से जो कुछ दे देता है, उसे खाकर प्रखनतापूर्वक वह अपना जीवन व्यतीत करता है।

प्रचीन काल में प्रायः सब के पुत्र गुरुकुलों में पढ़ने जाते थे, और भिन्न-भिन्न घरों से भिन्ना माँगते थे। इस लिये सब घरों