भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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कौ मातायें और बहिनें उत्तमोत्तम पदार्थ, जो ब्रह्मचारी द्वार पर आ जाता था, उसे दे देती थीं। वे यह समझती थीं कि इसी प्रकार हमारा पुत्र और भाई भी दूसरों के द्वार पर जाकर भिक्षा माँगाता होगा। अतएव इस प्रकार के सद्भाव से सभी ब्रह्मचारी सुखी रहते थे और उन्हें भिक्षा के लिये विशेष कष्ट नहीं करना पड़ता था। जो कुछ उन्हें प्राप्त हो जाता था, उसे ही लेकर चले जाते थे।

भिक्षा में मिली हुई सम्पूर्ण वस्तु गुरु को समर्पित कर देने का यह अभिप्राय था कि ब्रह्मचारी जिह्वा-लोलुपु न हो जाय। उस-के पास सब सामग्री रहने से वह अधिक भोजन कर जायगा और इससे रोग उत्पन्न होगा तथा उसके विद्याध्ययन में वित्र पड़ेगा। वह स्वार्थी बन जायगा और भोजन को ही सब कुछ समझ बैठेगा। इससे ब्रह्मचर्य-व्रत में हानि हो जायगी।

अब हम भिक्षा के सम्बन्ध में ब्रह्मचारी के लिये उपयोगी नियमों का वर्णन करते हैं:—

१—बेदज्ञ, यज्ञकर्त्ता और धर्मात्मा पुरुषों के घर से सदा भिक्षा लाना योग्य है। इस लिये कि सज्जनों के यहाँ से पवित्र और सात्विक पदार्थ ही दिया जाता है, जिससे स्वास्थ्थ और मन पर सुखा प्रभाव नहीं पड़ता।

२—आचार्य कुल सजाति और सम्बन्धियों के यहाँ से भिक्षा न लानी चाहिये। इसलिये कि इन स्थानों में जाने से सङ्कीर्ण होता है, जान-पहचान के कारण विशेष समय नष्ट होता है तथा अपमान का भी भय रहता है।

३—नीरोग रहने की दशा में एक सप्ताह तक भिक्षा माँगने