ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचारी के तीन प्रकार
न जाने से ब्रह्मचारी की प्रायश्चित रूप में 'अवकीर्ण ब्रत' करना पड़ता है। यह इसलिये कि असावधानी, प्रमाद और आलस्य उसमें न आने पावे।
४—एक ही घर का अन्न न लेकर, भिन्न-भिन्न घरों से भिन्ना ग्रहण करना उचित है। इसका अभिप्राय यह है कि एक ही गृहस्थ पर अधिक भार न पड़े, जिससे कि उसकी भिन्ना देने की श्रद्धा घट जाय।
“—दुष्ट, पातकी और अभिमानी के घर से भिन्ना लेने की अपेक्षा निराहार भर जाना भी उचित है। यह इसलिये कि अवमियों का अन्न अपवित्र तथा अशुभद्वय होता है। उसके ग्रहण करने से दुष्टि नष्ट हो जाती है और रोग उत्पन्न करता है, जिससे ब्रह्मचर्य-ब्रत खण्डित होने का भय रहता है।
१६—ब्रह्मचारी के तीन प्रकार
“ब्रह्मचारी ण्णंश्चरति रोदसी इमे।”
( अथर्ववेद )
ब्रह्मचारी भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के ज्ञान का अर्जन करके प्रचार करता है।
“ब्रह्म ब्रह्मचारिभि बद्धकामत् ।”
ब्रह्मचारी से ही ब्रह्मज्ञान का प्रकाश होता है।
छान्दोग्योपनिषद् में महत्व की दृष्टि से ब्रह्मचर्य के तीन प्रकार माने गये हैं। कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम। पहले में २४ वर्ष, दूसरे में ४४ वर्ष और तीसरे में ४८ वर्षों का विधान है।