भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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इस भाँति ब्रह्मचारी भी तीन प्रकार के होते हैं । कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम ।

कनिष्ठ ब्रह्मचर्य के सिद्ध होने पर ब्रह्मचारी की वसु संज्ञा होती है । 'वसु ब्रह्मचारी' के कहे जाने का अभिप्राय यह है कि २४ वर्ष के ब्रह्मचर्य से वह परम ऐश्वर्यशाली हो जाता है । मध्यम ब्रह्मचर्य के सिद्ध होने पर ब्रह्मचारी की रुद्र संज्ञा होती है । 'रुद्र ब्रह्मचारी' कहने का तात्पर्य यह है कि ४४ वर्ष के ब्रह्मचर्य से अत्यन्त पराक्रम प्राप्त होता है । और उत्तम ब्रह्मचर्य के सिद्ध होने पर ब्रह्मचारी की आदित्य संज्ञा होती है । 'आदित्य ब्रह्मचारी' कहने का आशय यह है कि ४८ वर्ष के ब्रह्मचर्य से वह उत्कट तेजस्वी हो जाता है ।

वसु ब्रह्मचारी को ऐश्वर्य, रुद्र ब्रह्मचारी को ऐश्वर्य और पराक्रम और आदित्य ब्रह्मचारी को ऐश्वर्य, पराक्रम तथा तेज—तीनों प्राप्त होते हैं । वैश्य को वसु, क्षत्रिय को रुद्र और ब्राह्मण को आदित्य ब्रह्मचारी बनाना चाहिये ।

वसु ब्रह्मचारी के सुख पर इन्द्र की सी कान्ति, रुद्र ब्रह्मचारी के सुख पर महादेव की सी गुरुता और आदित्य ब्रह्मचारी के सुख पर सूर्य की सी व्योतिः होती है ।

इस समय जनता में एक भी ऊपर कहे गये तीन प्रकार के ब्रह्मचारियों में से नहीं दिखाई पड़ता । भारतवर्ष के अधःपतन का इससे भी अनुमान लगाया जा सकता है । यदि पुनः प्राचीन ब्रह्मचर्य-प्रणाली का प्रचार हो जाय, तो आर्य-जाति के उद्धार में रक्षमात्र सन्देह नहीं ।