भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचारी के वर्जित कर्म

१७-ब्रह्मचारी के वर्जित कर्म

“गर्भो भूत्वाऽमृतस्ययोना विन्द्रो ह भूत्वाऽसुरास्ततर्है ।” (अथर्ववेद)

ब्रह्मचारी ज्ञान के केन्द्रस्थान से बाहर निकला। अब वह एकट विद्वान होकर दुर्गुणों का दृढ़ता से संहार करने लगा।

“तत्रास्य माता सावित्री, पिता त्वाचार्य उच्यते ।”

(मनुस्मृति)

गुरुकुल में शावित्री ब्रह्मचारी की माता और आचार्य पिता कहलाता है।

ब्रह्मचर्याश्रम का पालन करना सरल काम नहीं। एक भी असावधानी होने से अनेक विघ्न खड़े हो जाते हैं। ब्रह्मचारी को वड़े आचार-विचार से रहना पड़ता है। इस लिये विद्वान ऋषियों ने संयम और सदाचार से रहने का शास्त्रों में विधान किया है।

अब हम उन वर्जित कर्मों का वर्णन करते हैं, जिनके करने से ब्रह्मचारी पवित्र, उसका आत्मा निस्तेज और व्रत भङ्ग हो जाता है:—

वज्रैर्येनमुर्मासञ्च, गर्भं माल्यं तथा लियः।

शुकानि यानि सर्वाणि, प्राणिनाञ्चैव हिंसनम् ॥

मधु और मांस न खाय—पुष्पों की माला न पहने—सुगन्धित द्रव्य का व्यवहार न करे—सरस भोजन न करे—लियों में न रमे—सिरका आदि न खाय और जीवों को न मारे।

श्रम्यङ्गमञ्जनं चाक्षुषीरुपानच्छत्र धारयाम्।

कामं क्रोधञ्च लोभञ्च, नर्त्तनं गीतवादनम् ॥