ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 179, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विज्ञान
१७६
शरीर में तैल लगाना, आँखों में अखन देना, जूता और छाता धारण करना, काम, क्रोध, लोभ तथा गाना-बजाना वर्जित है।
यृतश्च जनवादश्च, परिवार्द तथाऽनूतम् ।
खीणाञ्च मेक्षणात्मममुपघातं परस्य च ॥
जुआ खेलना, किन्वदन्ती उड़ाना, निन्दा करना, असत्य बोलना, स्त्रियों को निहारना, और अङ्ग लगाना तथा दूसरे का अपकार करना मना है ।
हस्त्यश्वारोहरणं चैव, सन्त्यनेत्संजितेन्द्रियः ।
ब्रह्मचारी हाथी और घोड़े आदि सवारी पर न चढ़े ।
माना स्वस्वा दुहित्रा वा, न विविकान्तो भवेत् ।
बलवान्निन्द्रियश्रामो, विद्वांसमपि कर्पसि ॥
माता, बहन वा पुत्री किसी के साथ एकान्त में न बैठना चाहिये । क्योंकि इन्द्रियों का समूह बड़ा बलवान होता है, वह विद्वानों को भी अपनी ओर खींच ले जाता है ।
एकः शयीत सर्वत्र, न रेतस्कन्दयेत्कचित् ।
कामाद्विरस्कन्द्यत्र रेतो, हिनस्ति व्रतमात्मनः ॥
सर्वत्र अकेला सोवे । अपना वीर्य कभी कहीं स्खलित न होने दे । इच्छा से वीर्य का नाश करने से ब्रह्मचारी का व्रत नष्ट हो जाता है ।
उपयुक्त वालों के असिरिक भी ब्रह्मचारी के लिये बहुत से वर्जित कर्म हैं—
गुरु की आज्ञा बिना बैठना—उनके सामने उल्लूचासन पर बैठे रहना—उनके परोच में बिना आदर युक्त नाम लेकर उनका परिचय देना—उनकी निन्दा सुनना—उनके दोषों को कहना—