भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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ब्रह्मचारी के कर्तव्य कर्म

जैसे दूर रहना—खियों के समागम में बैठना—शुक्ती गुरु-पत्नी के चरण. हृफर प्रणाम तथा श्रृंगार करना एवं अभ्ययन में आलस्य करना आदि वर्जित है।

काम क्रोध तथा लोभ, स्वादुश्रृंगार कौतुके।

अति निद्रातिसेवे च, विद्यार्थी छाप वर्जयेत् ॥

( चाणक्य-नाति )

काम, क्रोध, लोभ, खाद, श्रृङ्गार, कौतुक, अति निद्रा और अति सेवा—ये आठ कर्म विद्यार्थी के लिये वर्जित हैं।

सुखार्थी चैत्यजेष्टिषां, विद्यार्थी चैत्यजेस्तुषम्।

सुखार्थिनः कुतो विद्या, सुखं विद्यार्थिनः कुतः ॥

( विदुरनाति )

सुख चाहने वाला विद्या के और विद्या का प्रेमी सुख को छोड़ दें। क्योंकि सुखार्थी को विद्या नहीं आती और विद्यार्थी को सुख नहीं मिलता।

आलस्यं मद् मोहो च, चापस्यं गोष्ठिरेव च।

स्तेन्द्यता चाभिमानित्वं, तथाऽत्यागित्वमेव च ॥

(बहुर्ननाति)

आलस्य, मद, मोह, चपलता, व्यर्थ बात चीत करना, जुप रहना, अभिमान करना और स्वार्थी होना—ये सात अवगुण विद्यार्थियों के माने गये हैं।

१८—ब्रह्मचारी के कर्तव्य कर्म

“श्रुत्योरहं ब्रह्मचारी यदस्मिन्निर्थाचन् भूतापुत्रं यमाय।” ( अथर्ववेद )