भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 181

ब्रह्मचर्य-विधान :

१७८

मैं पाप-नाशक आचार्य का ब्रह्मचारी हूँ । मैं और लोगों से भी प्रार्थना करता हूँ कि वे दूसरे को भी ( नवीन जीवन धारण करने के लिये ) उसके पास भेजें ।

“आचार्यों ब्रह्मण्यो मूर्तिः !”

( भगवद्वृत्ति )

आचार्य परमेश्वर का रूप है ।

ब्रह्मचर्य के पालन में वर्जित कर्मों के छोड़ देने से ही ब्रत की रक्षा होती है । सदाचार के नियमों के पालन से ही अकर्तव्यों का नाश हो सकता है । ब्रह्मचारी को एक तपस्वी समझना चाहिये । जिन कर्तव्यों से उसके जीवन में उत्साह, ज्ञान में वृद्धि और संसार में व्याप्ति होती है, उन्हीं का विधान प्रवीण शास्त्रकारों ने किया है ।

अब हम धर्मशास्त्र-सम्मत ब्रह्मचारी के कर्तव्य-कर्मों का वर्णन यहाँ करते हैं :—

यद्यस्य विहितं चर्मं, यत्सुखं या च मेखला ।

यो दृष्टो यथ वस्त्रं, तत्तदस्य ब्रतेऽपि ॥

उपनयन के समय जैसा शुग चर्म, यज्ञोपवीत, मेखला, दृष्ट और वस्त्र धारण कराया गया हो, उसी अवस्था में सदैव रहना चाहिये ।

सेवेतेमाम्बु नियमार, ब्रह्मचारी गुरौवसन् ।

सन्नियमेन्द्रियग्रामं, तपो वृद्धिर्ध्व्यं मात्मनः ॥

ब्रह्मचारी अपनी इन्द्रियों को वश में रख कर गुरु के समीप बतलाये गये कर्मों को ब्रत की उन्नति के लिये करता रहे ।

ब्रह्मचर्य विज्ञान · पृष्ठ 181, कुल 380 में से · BharatKosha