ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 181, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विधान :
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मैं पाप-नाशक आचार्य का ब्रह्मचारी हूँ । मैं और लोगों से भी प्रार्थना करता हूँ कि वे दूसरे को भी ( नवीन जीवन धारण करने के लिये ) उसके पास भेजें ।
“आचार्यों ब्रह्मण्यो मूर्तिः !”
( भगवद्वृत्ति )
आचार्य परमेश्वर का रूप है ।
ब्रह्मचर्य के पालन में वर्जित कर्मों के छोड़ देने से ही ब्रत की रक्षा होती है । सदाचार के नियमों के पालन से ही अकर्तव्यों का नाश हो सकता है । ब्रह्मचारी को एक तपस्वी समझना चाहिये । जिन कर्तव्यों से उसके जीवन में उत्साह, ज्ञान में वृद्धि और संसार में व्याप्ति होती है, उन्हीं का विधान प्रवीण शास्त्रकारों ने किया है ।
अब हम धर्मशास्त्र-सम्मत ब्रह्मचारी के कर्तव्य-कर्मों का वर्णन यहाँ करते हैं :—
यद्यस्य विहितं चर्मं, यत्सुखं या च मेखला ।
यो दृष्टो यथ वस्त्रं, तत्तदस्य ब्रतेऽपि ॥
उपनयन के समय जैसा शुग चर्म, यज्ञोपवीत, मेखला, दृष्ट और वस्त्र धारण कराया गया हो, उसी अवस्था में सदैव रहना चाहिये ।
सेवेतेमाम्बु नियमार, ब्रह्मचारी गुरौवसन् ।
सन्नियमेन्द्रियग्रामं, तपो वृद्धिर्ध्व्यं मात्मनः ॥
ब्रह्मचारी अपनी इन्द्रियों को वश में रख कर गुरु के समीप बतलाये गये कर्मों को ब्रत की उन्नति के लिये करता रहे ।