ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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शरीर में तैल लगाना, आँखों में अखन देना, जूता और छाता धारण करना, काम, क्रोध, लोभ तथा गाना-बजाना वर्जित है।
यृतश्च जनवादश्च, परिवार्द तथाऽनूतम् ।
खीणाञ्च मेक्षणात्मममुपघातं परस्य च ॥
जुआ खेलना, किन्वदन्ती उड़ाना, निन्दा करना, असत्य बोलना, स्त्रियों को निहारना, और अङ्ग लगाना तथा दूसरे का अपकार करना मना है ।
हस्त्यश्वारोहरणं चैव, सन्त्यनेत्संजितेन्द्रियः ।
ब्रह्मचारी हाथी और घोड़े आदि सवारी पर न चढ़े ।
माना स्वस्वा दुहित्रा वा, न विविकान्तो भवेत् ।
बलवान्निन्द्रियश्रामो, विद्वांसमपि कर्पसि ॥
माता, बहन वा पुत्री किसी के साथ एकान्त में न बैठना चाहिये । क्योंकि इन्द्रियों का समूह बड़ा बलवान होता है, वह विद्वानों को भी अपनी ओर खींच ले जाता है ।
एकः शयीत सर्वत्र, न रेतस्कन्दयेत्कचित् ।
कामाद्विरस्कन्द्यत्र रेतो, हिनस्ति व्रतमात्मनः ॥
सर्वत्र अकेला सोवे । अपना वीर्य कभी कहीं स्खलित न होने दे । इच्छा से वीर्य का नाश करने से ब्रह्मचारी का व्रत नष्ट हो जाता है ।
उपयुक्त वालों के असिरिक भी ब्रह्मचारी के लिये बहुत से वर्जित कर्म हैं—
गुरु की आज्ञा बिना बैठना—उनके सामने उल्लूचासन पर बैठे रहना—उनके परोच में बिना आदर युक्त नाम लेकर उनका परिचय देना—उनकी निन्दा सुनना—उनके दोषों को कहना—
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ब्रह्मचारी के कर्तव्य कर्म
जैसे दूर रहना—खियों के समागम में बैठना—शुक्ती गुरु-पत्नी के चरण. हृफर प्रणाम तथा श्रृंगार करना एवं अभ्ययन में आलस्य करना आदि वर्जित है।
काम क्रोध तथा लोभ, स्वादुश्रृंगार कौतुके।
अति निद्रातिसेवे च, विद्यार्थी छाप वर्जयेत् ॥
( चाणक्य-नाति )
काम, क्रोध, लोभ, खाद, श्रृङ्गार, कौतुक, अति निद्रा और अति सेवा—ये आठ कर्म विद्यार्थी के लिये वर्जित हैं।
सुखार्थी चैत्यजेष्टिषां, विद्यार्थी चैत्यजेस्तुषम्।
सुखार्थिनः कुतो विद्या, सुखं विद्यार्थिनः कुतः ॥
( विदुरनाति )
सुख चाहने वाला विद्या के और विद्या का प्रेमी सुख को छोड़ दें। क्योंकि सुखार्थी को विद्या नहीं आती और विद्यार्थी को सुख नहीं मिलता।
आलस्यं मद् मोहो च, चापस्यं गोष्ठिरेव च।
स्तेन्द्यता चाभिमानित्वं, तथाऽत्यागित्वमेव च ॥
(बहुर्ननाति)
आलस्य, मद, मोह, चपलता, व्यर्थ बात चीत करना, जुप रहना, अभिमान करना और स्वार्थी होना—ये सात अवगुण विद्यार्थियों के माने गये हैं।
१८—ब्रह्मचारी के कर्तव्य कर्म
“श्रुत्योरहं ब्रह्मचारी यदस्मिन्निर्थाचन् भूतापुत्रं यमाय।” ( अथर्ववेद )
ब्रह्मचर्य-विधान :
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मैं पाप-नाशक आचार्य का ब्रह्मचारी हूँ । मैं और लोगों से भी प्रार्थना करता हूँ कि वे दूसरे को भी ( नवीन जीवन धारण करने के लिये ) उसके पास भेजें ।
“आचार्यों ब्रह्मण्यो मूर्तिः !”
( भगवद्वृत्ति )
आचार्य परमेश्वर का रूप है ।
ब्रह्मचर्य के पालन में वर्जित कर्मों के छोड़ देने से ही ब्रत की रक्षा होती है । सदाचार के नियमों के पालन से ही अकर्तव्यों का नाश हो सकता है । ब्रह्मचारी को एक तपस्वी समझना चाहिये । जिन कर्तव्यों से उसके जीवन में उत्साह, ज्ञान में वृद्धि और संसार में व्याप्ति होती है, उन्हीं का विधान प्रवीण शास्त्रकारों ने किया है ।
अब हम धर्मशास्त्र-सम्मत ब्रह्मचारी के कर्तव्य-कर्मों का वर्णन यहाँ करते हैं :—
यद्यस्य विहितं चर्मं, यत्सुखं या च मेखला ।
यो दृष्टो यथ वस्त्रं, तत्तदस्य ब्रतेऽपि ॥
उपनयन के समय जैसा शुग चर्म, यज्ञोपवीत, मेखला, दृष्ट और वस्त्र धारण कराया गया हो, उसी अवस्था में सदैव रहना चाहिये ।
सेवेतेमाम्बु नियमार, ब्रह्मचारी गुरौवसन् ।
सन्नियमेन्द्रियग्रामं, तपो वृद्धिर्ध्व्यं मात्मनः ॥
ब्रह्मचारी अपनी इन्द्रियों को वश में रख कर गुरु के समीप बतलाये गये कर्मों को ब्रत की उन्नति के लिये करता रहे ।
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ब्रह्मचारी के कर्तव्य कर्म
नित्यं स्नात्वा शुचिः कुर्यादेवधिपितु तर्पणम् । देवताभ्यर्चनं ऋचैव, सविदाद्यान मेव च ॥ सदैव स्नान करके पवित्रता से देव, ऋषि और पितरों का तर्पण तथा देव-पूजन और अभिहोत्र करता रहे ।
उदकुम्भं सुमनसो, गोशङ्खमुत्तिका कुशान् । आहरेद्यावदथानि, भैरुं चाहुरहस्यरेत् ॥
जल का घड़ा, फूल, गोबर और कुश, जिस वस्तु की जितनी आवश्यकता हो, उतनी ही लावे । और निरन्तर भिक्षा भागने जाया करे ।
दूरादाहस्य समिधः, सन्निद्ध्याद्विहायसि । सायं प्रातश्च जुह्यतामिन्द्रमन्तद्वितः ॥
दूर से समिधा ( होम की लकड़ी ) लाकर उसमें स्थान पर घरे और उससे आलस्य-रहित होकर सायं और प्रातःकाल अग्नि- होत्र करे ।
स्वमे सित्का ब्रह्मचारी, द्विज शुक्रमकामतः । आत्माकर्मचर्यवित्वाभिः, पुनर्मासितुं जपेत् ॥
यदि विना इच्छा के स्वप्न में वीर्य गिर जाय तो, स्नान कर सूर्य भगवान् की पूजा के पश्चात् “पुनर्मासितिन्द्रियम्” नाम की ऋचा का जप करे ।
शरीरञ्चैव वाचञ्च, बुद्धिन्द्रिय मनोसिच । नियम्य प्राज्ञकलितद्वेष्टीक्षमाणी गुणोमुखम् ॥
शरीर, वाणी, बुद्धि, इन्द्रिय और मन को अधिकार में करके नम्रता-पूर्वक गुरु के सममुख रहा करे ।
कुर्याद्व्ययनञ्चैव, ब्रह्मचारी यथा विधिः । विधि त्यक्त्वा ऋकुर्वाणो, न स्वाध्याय फलं लभेत् ॥
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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ब्रह्मचारी को चाहिये कि नियम के साथ अध्ययन किया करे। क्योंकि बिना नियम के पढ़ने से उसका कुछ फल नहीं मिलता।
अग्नीन्धनं भैक्षचर्यामिधः शून्यांगुरोर्हितम् ।
आसमाघर्त्तानात्कुर्यात्कृतोपनयनो द्विजः ॥
यज्ञोपवीत किया हुआ ब्रह्मचारी गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने तक यज्ञ की समिधा और भिक्षा लाने में, पृथ्वी पर सोने तथा गुरु का हित करने में, लगा रहे।
इन ऊपर कही गई बातों के अतिरिक्त और भी ब्रह्मचारी के कई कर्तव्य-कर्म इस प्रकार हैं:—
सूर्योदय से पहले उठ जाना—मित्य नियम से अध्ययन करना—पढ़ने के आदि और अन्त में गुरु को प्रणाम करना—सहपाठियों से प्रेम रखना—आचरण से गुरु को प्रसन्न रखना—अतिथियों का सत्कार करना—अवस्था में बड़े लोगों की—पहले माता-पितादि की सेवा करना, अभिवादन करना—अपने ब्रह्मचर्य का ध्यान रखना तथा साधुता और सरलता युक्त रहना ही कर्तव्य है।
१६—आचार्य के कर्तव्य
आचार्यां श्रुत्युर्वरुणः सोम श्लोषधयः पयः ।”
(अथर्ववेद)
आचार्य शिष्य के लिये पापनाशक, शान्तिदाता, जीवन सुधारक, रोग-निवारक और ज्ञान का उपदेशक होता है।
“कुशियम्भ्यापयतः कुतो यशः ।”
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आचार्य के कर्तव्य
दुष्ट शिष्य को ज्ञानोपदेश करने से आचार्य को कैसे यश प्राप्त हो सकता है !
प्राचीन समय से इस देश में आचार्य का बड़ा महत्व माना गया है ! गुरुकुल के अधिप्राप्ता होने के अतिरिक्त वह संसार का सुधारक है। मनुष्य-जाति का पतन और वस्थान का उत्तरदायित्व आचार्य पर है। बालक के लिये आचार्य से बढ़ कर कोई द्वितीय होता ही नहीं। ऐसे गुरुप के लिये भी शास्त्रों में कर्तव्य निर्धारित किये गये हैं। हम उनका सारांश यहाँ पर दे देना चाहते हैं:—
१—आचार्य को स्वयं प्रहचारी होना चाहिये।
२—उसे सब छात्रों पर सम दृष्टि रखना योग्य है।
३—ग्राह्यचारियों के स्वार्थ्य और सदाचार पर पूर्ण रूप से ध्यान रखे।
४—अपने छात्रों से अधिकार के बाहर काम न ले।
५—नियमित वित्तियों से अधिक अनध्याय (छुट्टी) की आज्ञा न दे।
६—विद्यार्थी की उत्पत्ति-कामना के लिये निरन्तर उद्योग करता रहे।
७—आचार्य-पुत्र, सेवक, ज्ञानदाता, धार्मिक, पवित्र, शास्त्रिक, बलवान्, धनदाता, सरल स्वभावी और रज्जातीय—ऐसे दस प्रकार के शिष्य को पढ़ाना कर्तव्य है।
८—जिस विषय में उसे सन्देह हो, उसे बिना समझे विद्यार्थी को न पढ़ावे।
९—अज्ञानत विचर होने के समय में कभी शिवा न दे।
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१०—अग्निहोत्र और सन्ध्या-वन्दन में शिष्यों को भी साथ ले लिया करे ।
११—ब्रह्मचारी को व्रत पालन के लिये उत्साहित करता रहे ।
१२—विद्यार्थियों के फार्थ और आपण से उनकी योग्यता की परीक्षा करता रहे ।
१३—आचार्य को लोभी, क्रोधी, विषयी, असत्य भापी, परनिन्दक, असहिष्णु और द्वेषी न होना चाहिये ।
१४—विना प्रभाव और स्नेह के शिष्यों को विद्वान् नहीं बनाया जा सकता ।
१५—ब्रह्मचारी को आह्लाकारी बना लेना उसका प्रथम कर्तव्य है ।
२०—अष्ट मैथुन-निषेध
“आयुर्वीर्यं यशस्वैव, हन्यतेऽब्रह्मचर्याया ।”
मैथुन ( ब्रह्मचर्य ) से आयु, वीर्य तथा यश की हानि होती है ।
ब्रह्मचर्य जैसे महाव्रत के नाश करनेवाले दुर्लुप्य का नाम ‘मैथुन’ है । मैथुन उस साधन को कहते हैं, जिससे किसी न किसी प्राकृतिक या अप्राकृतिक रूप से मनुष्य का वीर्य अपना स्थान छोड़ कर ज्ञात या अज्ञात अवस्था में बाहर निकल जाय । यही कारण है कि ब्रह्मचारियों के लिये शास्त्रों में मैथुन का निषेध किया गया है ।
स्वरूपं कीर्त्तनं केलिः, प्रेक्षणं गृह्य भाषणम् ।
सङ्कल्पोऽप्यवसायश्च, क्लिया-निष्पत्तिरेव च ॥
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आष्ट मैथुन-निषेध
पतन्मैथुनमद्वद्वाः, प्रवदन्तिमनीषिणः । विपरीतं ब्रह्मचर्यं, मेतदेपाएलक्षणम् ॥
( दक्ष-संहिता )
स्मरण, कीर्तन, केलि, अवलोकन, गुप्त भाषण, सङ्कल्प, अश्व्यवसाय और क्रिया-निवृत्ति—ये मैथुन के आठ अङ्ग विद्वानों द्वारा निर्धारित किये गये हैं ।
इन आठ लक्षणों से परे रहना 'सिद्ध ब्रह्मचर्य' कहलाता है । १—स्मरण—प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष देखी या सुनी हुई खियों के रूप-लावण्य का ध्यान करना ।
२—कीर्तन—खियों के गुण, स्वरूप और सुख की कथा कहना, या तो तत्सम्बन्धी गान करना ।
३—केलि—खियों के साथ नाना प्रकार के खेल—जैसे, फाग आदि खेलना ।
४—प्रेक्षण—किसी स्त्री को काम-दृष्टि से बारबार देखना और सङ्केत करना ।
५—गुह्य भाषण—खियों के पास जा कर गुप्त रूप से भोगेच्छा प्रकट करने वाली बातें करना ।
६—सङ्कल्प—खियों को देख कर या उनके चरित्र सुन कर उनके पाने की धारणा मन में लाना ।
७—अश्व्यवसाय—खियों के सहवास में आनन्द का अनुमान कर उसके पाने के लिये प्रयत्न करना ।
८—क्रिया-निवृत्ति—खियों को मोह-जाल में फँस कर उनसे सम्भोग करना ।
इन आठ प्रकार के मैथुनों में पहले से दूसरा, दूसरे से तीसरा
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तीसरे से चौथा, चौथे से पाँचवाँ, पाँचवें से छठवाँ, छठे से सातवाँ और सातवें से आठवाँ अत्यन्त भयङ्कर है। एक भी मैथुन में फँस जाने से मनुष्य सम्पूर्ण मैथुन में मृद्य हो जाता है। इनमें प्रत्येक मैथुन का अन्तिम परिणाम वीर्य-नाश होता है। इन मैथुनों के प्रभाव से वीर्य के कण अपने स्थान से विच्युत होकर अंगकोप में पहुँच जाते हैं, जो अवसर पाकर अवश्य बाहर हो जाते हैं। इसीलिये ब्रह्मचारी को चाहिये कि इन आठ प्रकार के मैथुनों से अपने ब्रह्मचर्य की रक्षा करता रहे।
हमारे मत से आठ प्रकार के मैथुनों से बँचने के लिये आठ प्रकार के संयम की आवश्यकता होती है। इसलिये जिन आठ प्रकार के सुसाधनों से ब्रह्मचर्य की रक्षा हो, वे भी ब्रह्मचर्य के ही समान हैं। अतः इस प्रकार आठ प्रकार के मैथुन करने के विरोधक भाव आठ प्रकार के ब्रह्मचर्य हैं। ब्रह्मचर्यावस्था में इन आठ प्रकार के ब्रह्मचर्य की भी अत्यन्त आवश्यकता है।
२१—वेदाध्ययन-विचार
“तस्माद्धेदव्रतानीह, चरेत्स्वाध्याय-सिद्धये।”
(हार्दतस्मृति)
ब्रह्मचारी को चाहिये कि अपने अध्ययन की सिद्धि पाने के लिये वेद में कहे गये नियमों का पालन करे।
“सदाधारं पृथिवीं दिवश्चास आचार्यं तपसा पिपत्ति।”
(यथर्ववेद)
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वेदाध्ययन-विचार
ब्रह्मचारी भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान को धारण करता है; वह अपने इस तप से आचार्य की प्रसन्नता का कारण होता है।
ब्रह्मचर्याश्रम और वेदाध्ययन का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। गुरुकुल में मेजने का अभिप्राय ही यह है कि बालक वेद की शिखा प्राप्त करे। सुबोध आचार्य की संरक्षकता में वेदों के ज्ञान ने का विधान शास्त्रकारों ने किया है। ब्रह्मचारी होने का प्रयत्न सदैव वेदाश्रम माना गया है।
यह बात सब को विदित है कि वेदों में सब प्रकार की विचार्य, मनुष्य-जाति को सुख देने वाली भरी हुई हैं। इस भूम-गंडल में वैदिक साहित्य सब से श्रेष्ठ और प्राचीन माना गया है। जो वेदों का ज्ञान प्राप्त करले, उसे विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं रह जाती। उसके लिये सब सुलभ हो जाता है। हमारे ऋषि-मुनि लोग इन्हीं वेदों के चल पर देश तथा धर्म की रक्षा और उद्धार करते थे।
गुरुकुलों में आचार्य, वेद तथा उसके परिचय कराते वाले वेदाङ्गों का परिचय करा देता था। जैसे सूर्य का प्रकाश धारण कर चन्द्रमा प्रकाशित होता है, वैसे ही शिष्य भी अपने गुरु से ज्ञानार्जन कर कुल और जाति को आनन्दित करता है। वास्तव में वेदाध्ययन का प्रयोजन यही है कि गृहस्थाश्रम सुखमय बने।
अब हम आचार्य मनु के मत से वेदाध्ययन के काल और प्रकार का वर्णन कर देना चाहते हैं:—
पद्म त्रिशद्वान्दिकं चर्यं, गुरोः त्रैवेदिकं व्रतम्।
तदधिकं पादिकंवा, ग्रहणान्निक्त मेव वा॥
गुरुकुल में ब्रह्मचर्य से रहकर, ३६ वर्ष में तीनों वेदों (ऋगु,
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यजु और साम ) को पढ़े। अर्थात् १२ वर्षों तक एक वेद की शाखा का विधान है। १८ वर्षों में या ९ वर्षों में भी तीनों वेद पढ़े जा सकते हैं। अर्थात् ६ या ३ वर्षों में एक वेद की शाखा को समाप्त करे।
वेदान्धीत्य वेदो वा, वेदं चापि यथा क्रमम्।
अविष्णुतो ब्रह्मचर्या, गृहस्थाश्रममावसेत् ॥
तीन, दो या एक वेद विधि-पूर्वक पढ़कर अखण्डित ब्रह्मचर्य से गृहस्थाश्रम में पैर रखे।
३६ वर्षों में वेद पढ़ना उत्तम १८ वर्षों में मध्यम और ९ वर्षों में अधम माना गया है। ब्रह्मचर्यावस्था में ३, २ या १ वेद को अवश्य पढ़ लेना चाहिये।
२२—ब्रह्मचारी-वेद
“ब्रह्मचारी चरति वेदपिप्त्रिषः। स देवानां भवत्येकमङ्गम् ॥”
(ऋग्वेद)
ब्रह्मचारी उत्तम कर्मों के साथ अपने व्रत का पालन करता है। अतएव वह देवों का एक अङ्ग बन जाता है।
“ब्रह्मचारी समिधा मेखलया अमेघ लोकांस्तपसा पिपत्तिं।”
(अथर्ववेद)
ब्रह्मचारी अपनी विद्या, कठिनश्रद्धा, परिश्रम-शीलता और सहिष्णुता से संसार का चपकार करता है।
गुरुकुल के वास-वेद से ब्रह्मचर्य के दो प्रकार होते हैं। उप-कुर्ब्या, और ‘नैष्ठिक’। इसलिये ब्रह्मचारी भी दो प्रकार के ठहरे।
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ब्रह्मचारी-भेद
उपकुर्वाण की अवस्था एक नियमित काल तक रहती है । उसकी समाप्ति हो जाने पर, गृहस्थाश्रम में पदार्पण किया जा सकता है । ब्रह्मचर्य-पालन, गुरु-सेवा, विद्याध्ययन के पश्चात् गुरु-दक्षिणा देने तक, वह ब्रह्मचारी उपकुर्वाण कहलाता है ।
“अविष्णुत ब्रह्मचर्यो, गृहस्थाश्रममावसेत् ।”
( धर्माचार्य भट्ट )
अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन कर लेने पर गृहस्थाश्रम में वास करे ।
अब हम उपकुर्वाण ब्रह्मचारी के शास्त्रोक्त कर्तव्य-कर्मों का वर्णन करते हैं । इनके पालन से ही वह अपने महाव्रत में सिद्धि पा सकता है:—
१—गुरु की आहा का पालन तथा उसकी सेवा करता रहे ।
२—मन लगाकर विद्याध्ययन करने में सावधान रहे ।
३—भिन्ना सांगिकर सात्विक प्रकार से अपना जीवन निर्वाह करे ।
४—ब्रह्मचर्य-रक्षा के लिये सदैव उपाय करता रहे ।
५—अपनी उन्नति का सर्वदा मनन और चिन्तन किया करे ।
जो ब्रह्मचारी अपने व्रत के महत्व को समझ लेता है—जिसका मन वेदाध्ययन से संयमित बन जाता है—जिसकी इच्छा प्रकृति के अतुराग में लग जाती है—ज्ञान देने के कारण गुरु ही जिसका सर्वस्व हो जाता है और संसार से वैराग्य हो जाता है—वह जीवन पर्यन्त ब्रह्मचारी रहता है । उसकी नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहते हैं । उसके लिये यह आहा है:—
“न विवाहो न सन्यासो, नैष्ठिकस्य विधीयते ।”
( महामान्य-धारत )
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिये न तो विवाह और न सन्यास का विधान है।
अब इस नैष्ठिक ब्रह्मचारी के उन कर्तव्य-कर्मों का वर्णन कर देना चाहते हैं, जिनसे उनका जन्म सार्थक होता है:—
१—गुरु के सत्सङ्ग में ब्रह्मचर्य-पूर्वक विद्याध्ययन करता रहे।
२—गुरु के न रहने पर उसके विद्वान पुत्रों के समागम में आध्यात्मिक विचार करता रहे।
३—गुरु-पुत्रों के अभाव में उसकी पत्नी का पालन-पोषण धर्मयुक्त करता रहे।
४—यदि गुरु-पत्नी भी न हो, तो गुरु-कुल वासियों के साथ रहे।
५—सबके अभाव में यज्ञागृहान् करता रहे।
२३—गुरु-दक्षिणा-प्रकरण
“आचार्यों भूत्वा वरुणो यद्यदैच्छत प्रजापती।
तद्ब्रह्मचारी प्रायच्छत्सान् मित्रो अध्यात्मनः ॥”
(अथर्ववेद:)
आचार्य वरुण (सुखदायक) बनकर जनता के हितार्थ, जो दक्षिणा माँगता है, ब्रह्मचारी उसे अपने आत्मबल से मित्र (सहायक) होकर देता है।
“गुरु शुश्रूषा त्वैव, ब्रह्मलोकं समश्नुते।”
(भृद्धरथि)
गुरु की सेवा से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।
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गुरु-दक्षिणा-प्रकरण
गुरुकुल में विद्याध्ययन के समाप्त हो जाने पर, विद्यार्थी को घर जाने की आज्ञा मिलती है। उस समय वह अपने गुरु को सन्तुष्ट रखने के लिये उसकी इच्छा के अनुकूल, जो कुछ प्रदान करता है, उसको 'गुरु-दक्षिणा' कहते हैं। इस दक्षिणा का बड़ा महत्व है। प्रायः अनेक ग्रन्थों में इसका वर्णन मिलता है।
प्राचीन समय में गुरु-दक्षिणा शिष्टाचार का एक अङ्ग था। गुरु के उपकार के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने के लिये, ब्रह्मचारी उससे गुरु-दक्षिणा देने की प्रार्थना करता था। गुरु भी उसकी विनय-शीलता और आज्ञा-पालन से प्रसन्न हो कर उसे जनता के उपकार का आदेश देता था। यही उसकी दक्षिणा थी। और पहले के आचार्यों को किसी प्रकार की इच्छा या आवश्यकता नहीं रहती थी। गुरु की जो आज्ञा होती थी, उसे पालन करने की ब्रह्मचारी प्रतिज्ञा करता था, और उसका आशीर्वाद प्राप्त कर संसार में प्रविष्ट होता था।
शङ्कराचार्य के गुरु कुमारिल भट्ट ने अबेदिक-धर्म का खण्डन और सनातन-धर्म के मण्डन की दक्षिणा माँगी थी, जिसे उन्होंने (शंकराचार्य) जीवन भर पालन कर दिखाया। स्वामी दयानन्द के आचार्य विरजानन्द ने उन्हें जनता में वेद तथा सत्य-धर्म के प्रचार का आदेश किया था, जिसे उन्होंने पालन कर दिखाया।
गुरु-दक्षिणा ब्रह्मचारी के लिये एक अन्तिम कर्तव्य माना गया है। अतएव धर्मशास्त्र के अनुसार हम उसका भी वर्णन करते हैं:—
न पूर्णं गुरवे किञ्चिदुपकुर्वीत धर्मविद। स्नात्स्यन्तु गुरवाक्षतः, शक्त्यागुर्वर्धमाहरेत्॥
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ब्रह्मचर्यावस्था में धर्म का जाननेवाला, गुरु को कुछ भी न दे । पर ब्रह्मचर्य का पालन कर 'ज्ञातक' हो जाने पर वह जो आत्मा दे, यथाशक्ति उसे वह दक्षिणा दे ।
लेत्रं हिरण्यं गामश्चं, छत्रोपानहमासनम् । धान्यं शाकञ्च वासंसि, गुरुवे प्रीतिमावहेत्॥
पृथ्वी, सोना, गाय, अश्व, छाता, जूता, आसन, धान्य, शाक और वस्त्र—जो कुछ दे सकें, गुरु की प्रसन्नता के लिये समर्पित करें ।
जो ब्रह्मचारी ज्ञान प्राप्त कर लेने पर अपने आचार्य को उसकी माँगी हुई वस्तु देकर प्रसन्न करता है, उसकी विद्या में वृद्धि होती है, और उसी से जन-समाज का कल्याण-साधन हो सकता है ।
२४—समावर्त्तन-संस्कार
“स स्नातो वभुः पिङ्गलः पृथिव्यां बहु रोचते ।” (अथर्ववेद)
ब्रह्मचारी विद्या पढ़ लेने पर ज्ञातक होता है । इस प्रकार अत्यन्त तेजस्वी होकर संसार में सम्मान पाता है ।
“राज-स्नातक्योश्चैव, ज्ञातको रूपमान भाक् ।”
राजा और ज्ञातक दोनों में राजा की अपेक्षा ज्ञातक विशेष मान्य है ।
“गुरुवे दक्षिणां दद्यात्संयमी ग्राममावसेत् ।”
(हारीत-स्मृति)
वेदाध्ययन समाप्त होने पर गुरु को दक्षिणा देकर जितेन्द्रियता से ग्राम में निवास करें ।
२९१
समावर्त्तन-संस्कार
उपनयन-संस्कार से ब्रह्मचर्याश्रम का प्रारम्भ और समावर्त्तन-संस्कार से उसकी समाप्ति होती है। उपनीत होकर ब्रह्मचारी गुरु-कुल में प्रविष्ट होता है, और स्नातक होकर उससे बाहर निकलता है। इस संस्कार में ब्रह्मचारी की तीर्थों के जल से स्नान कराय जाता है और तब से उसको 'स्नातक' कहा जाता है।
“सम्रह्मचारी यो विद्या-व्रत-स्नातः।”
(छन्दोग्योपनिषद्)
वह ब्रह्मचारी है, जिसने विद्याव्रत रूपी तीर्थों के जल में स्नान किया हो।
इस संस्कार के समय गुरु को यथा-शक्ति दक्षिणा दी जाती है, और गुरु उस ब्रह्मचारी के आयुर्वल, यशःप्रसार, ज्ञानगौरव और धनधान्य का आशीर्वाद देता है।
इस संस्कार से ब्रह्मचारी अपने आचार्य के संरक्षण से पृथक् होता है। अधिक समय के एक साथ रहने से दोनों में अत्यन्त अभिन्नता हो जाती है। अतएव मोह के धन्यन को तोड़ कर आचार्य उसे शुद्ध्याश्रम में जाने और अपना कर्तव्य पालन करने का उपदेश इस समय भी देता है:—
१—प्रमाद में पड़ कर ब्रह्मचर्य-व्रत का दुःखयोग न करना।
२—अपनी विद्या और वल से लोक-सेवा में सदा लगे रहना।
३—पञ्चमहायज्ञ में कभी प्रान्ति से असावधानी न करना।
४—माता-पिता तथा कुटुम्ब के भरण-पोषण को अपने हाथ में लेना।
५—सुयज्ञ उत्पन्न करने के लिये विधि-पूर्वक विवाह करना।
६—सदाचारी और उत्तम पुरुषों का सङ्ग करना।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
२९२
- ७—धर्म तथा धन का सन्धय करते रहना ।
- ८—अधर्ममूलक व्यवसाय में कभी न लिपटना ।
- ९—क्रोध, मोह, लोभ, भोग और दुर्घ से दूर ही रहना ।
- १०—गृहस्थाश्रम को नियत समय तक सुखमय बनाते रहना ।
२५—विवाह-विधान
“ब्रह्मचर्यं समाप्याथ, गृहधर्मं समाचरेत् ।”
ब्रह्मचर्याश्रम को समाप्त कर गृहस्थ-धर्म का पालन करना योग्य है ।
उद्धेत द्विजोभायां, सवर्णं लक्षणन्विताम् ।”
(मनुस्मृति)
स्नातक को चाहिये कि सवर्णों और मुलच्छियों वाली कन्या से विवाह करे ।
ब्रह्मचारी वीर्य-रक्षण सहित ज्ञानार्जन कर लेने पर, गुरु की आज्ञा से स्नातक होकर घर आता है । उस अवस्था में उसके पिता या उसके समान अधिकारी उसका सत्कार करते हैं । इसके अनन्तर विवाह का समय आता है । वर अपने सम्बन्धियों के साथ कन्या के पिता के यहाँ पहुँचता है । कन्या-पक्ष से उसका द्वार—पूजन (स्वागत) होता है, तदनन्तर ‘जनवास’ दिया जाता है । विवाह के विशिष्ट समय पर वर विवाह-मण्डप में जाता है । कन्या का पिता उसका ‘मनुषक’ अर्थात् उत्तम पदार्थों से सत्कार कर बैठता है । फिर अभिदेव का स्थापन कर वर, वधू का पाणि-भरण कर इस प्रकार कहता है—
२९३
विवाह-विधान
मैं तुम्हें अपनी पत्नी बनाता हूँ। तू उत्तम सन्तान वाली हो। मेरे साथ तुम्हें भी दीर्घ जीवन प्राप्त हो। अर्थात् दिवों ने गृह-स्थाश्रम के लिये तुम्हें प्रदान किया है। तेरी शुभ दृष्टि हो—तुम्हें से पति का हित हो—पशुओं का कल्याण हो—तू मनोहर हृदय और नेत्रवाली हो। तेरे पुत्र जीवित और पुत्रपार्थी हों। तुम्हें से सब को सुख प्राप्त हो।
फिर वर वधू से ध्वन करता है और वह पत् के दीर्घ-जीवन एवं सम्बन्धियों के सुख की प्रार्थना करती है। तदनन्तर 'सप्तपदी' होती है। इसमें वर वधू को साथ लेकर सात बार फेरी करता है, और उससे अपने अनुकूल रहने की प्रतिज्ञा करता है। इसी समय से दोनों पति-पत्नी (दम्पति) बन जाते हैं। पश्चात् कन्या का पिता भी वर से निम्नलिखित प्रतिज्ञा करता है:—
यस्त्वया धर्मश्चरितव्यः सोऽनयासह ।
धर्मं चार्थं च कामे च, नाति चरितव्यं ॥
जो कुछ सत्कर्म करना हो, इस (कन्या) की सहकारिता सं करता—धर्म, अर्थ और काम मैं इसके विरुद्ध आचरण न करना।
इस पर वर भी उसकी बातों को जलपूर्वक इस प्रकार स्वीकार करता है:—
नाति चरामि, नातिचरामि नातिचरामि ।”
मैं कभी इसके विरुद्ध आचरण नहीं करूँगा—नहीं करूँगा और नहीं करूँगा !
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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२६—गृहस्थ ब्रह्मचर्य
“ऋतुकालाभिगमनं, ब्रह्मचर्यमिवोच्यते ।”
ऋतु काल में स्त्री-प्रासङ्ग करना भी ब्रह्मचर्य के बराबर माना जाता है । विवाह सम्बन्ध में देखिये, भारत के आधुनिक राष्ट्र-निर्माता महात्मा गान्धी जी क्या कहते हैं:—
“विवाह स्नेच्छाचार ( असाधारिक मैथुन ) के लिये नहीं है । स्थूलियों में भी लिखा है कि दम्पति-नियम से रहते हुये, वै भी ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते हैं ।”
विवाह मानवी स्तुति के चलाने के लिए एक धार्मिक तथा स्वामाविक कर्तव्य है । इसका विधिवत् पालन करने से गृहस्थाश्रम सुख और शान्ति का देने वाला होता है । इस के विरुद्ध जाने से दम्पति का जीवन अत्यन्त दुःख-कारक बन जाता है । विवाह का विधान बहुत प्राचीन तथा शास्त्रीय है । इसके उद्देश्य के सम्बन्ध में मनु महाराज यह आज्ञा देते हैं:—
“ऋणुजय विमुत्स्यै, धर्मणीत्पादयोत्पन्ना ।”
तीनों ऋणों ( देव, ऋषि तथा पित्रु ) के बन्धन से छूटने के लिये धर्म-पूर्वक प्रजा का उत्पादन करे ।
विवाह का उद्देश्य ही है कि धर्म-युक्त प्रजा उत्पन्न की जाय । गृहस्थाश्रम में भी पुरुष और स्त्री को संयम से रहने की शास्त्र में आज्ञा है । अब तो अज्ञानता के कारण गृहस्थाश्रम अत्यन्त दुःखित हो रहा है । सुप्रजा उत्पन्न करना तो दूर रहा, विवाह होते ही कामवासनाओं को उत्पन्न करने का उद्योग होने लगता है । इस कुवृत्ति की साधना में सन्तान हो जाय, तो हो जाय; पर इसका
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गृहस्थ ब्रह्मचर्य
ज्ञान किस को रहता है। हम बल-पूर्वक कहते हैं कि १५ शतक युवकों का गर्भाधान अनियमित रूप से होता है। इसे हम कैसे धर्म-पूर्वक कह सकते हैं। यही कारण है कि समाज की दिन पर दिन क्षीणता होती जाती है। अधर्म-युक्त प्रजा कभी अच्छी नहीं हो सकती। बहुत उचित कहा गया है:—
“सन्तानार्थेन मैथुनम्।”
केवल सन्तान उत्पन्न करने के लिये ही मैथुन का विधान है। गृहस्थाश्रम में भी ब्रह्मचर्य का विधान है। जो पुरुष नियत समय पर सन्तान को अभिलाषा से स्त्री का समागम करता है, वह भी ब्रह्मचारी है। ‘एकनारी ब्रह्मचारी’ ऐसी कहावत है। पर एकनारी रहने पर भी मनुष्य पर-स्वो सेवन न करने से भी न्य-भिचारी माना जा सकता है; शास्त्र को आहा है:—
“श्रुतीभ्यांमुपेयात्।”
श्रुतुकाल में भार्या का सेवन करना धर्म है। इसका अभि-प्राय यह है कि रजोदर्शन के पश्चात् स्त्रियाँ गर्भधारण कर सकती हैं। अन्य समय में केवल बीर्य-नाश होता है। इसलिये बाल-हत्या का महा पातक लगता है। मनु भगवान की आहा है:—
“ब्रह्मचार्येभ्य भवति, यत्रतत्राश्रमे वसन्।”
श्रुतुकाल की वजित रात्रियों को छोड़ कर स्त्री-सहवास करने वाला पुरुष जिस किसी आश्रम में हो—ब्रह्मचारी ही है। इस वचन से भी गृहस्थाश्रम में ब्रह्मचर्य का पालन करना योग्य है। स्त्री समागम के पश्चात् गर्भ के लक्षणों का ज्ञान हो जाने पर, सन्तानोत्पत्ति के तीन वर्ष पश्चात् पुनः गर्भाधान करने की