ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वेदाध्ययन-विचार
ब्रह्मचारी भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान को धारण करता है; वह अपने इस तप से आचार्य की प्रसन्नता का कारण होता है।
ब्रह्मचर्याश्रम और वेदाध्ययन का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। गुरुकुल में मेजने का अभिप्राय ही यह है कि बालक वेद की शिखा प्राप्त करे। सुबोध आचार्य की संरक्षकता में वेदों के ज्ञान ने का विधान शास्त्रकारों ने किया है। ब्रह्मचारी होने का प्रयत्न सदैव वेदाश्रम माना गया है।
यह बात सब को विदित है कि वेदों में सब प्रकार की विचार्य, मनुष्य-जाति को सुख देने वाली भरी हुई हैं। इस भूम-गंडल में वैदिक साहित्य सब से श्रेष्ठ और प्राचीन माना गया है। जो वेदों का ज्ञान प्राप्त करले, उसे विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं रह जाती। उसके लिये सब सुलभ हो जाता है। हमारे ऋषि-मुनि लोग इन्हीं वेदों के चल पर देश तथा धर्म की रक्षा और उद्धार करते थे।
गुरुकुलों में आचार्य, वेद तथा उसके परिचय कराते वाले वेदाङ्गों का परिचय करा देता था। जैसे सूर्य का प्रकाश धारण कर चन्द्रमा प्रकाशित होता है, वैसे ही शिष्य भी अपने गुरु से ज्ञानार्जन कर कुल और जाति को आनन्दित करता है। वास्तव में वेदाध्ययन का प्रयोजन यही है कि गृहस्थाश्रम सुखमय बने।
अब हम आचार्य मनु के मत से वेदाध्ययन के काल और प्रकार का वर्णन कर देना चाहते हैं:—
पद्म त्रिशद्वान्दिकं चर्यं, गुरोः त्रैवेदिकं व्रतम्।
तदधिकं पादिकंवा, ग्रहणान्निक्त मेव वा॥
गुरुकुल में ब्रह्मचर्य से रहकर, ३६ वर्ष में तीनों वेदों (ऋगु,
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