भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य-विधान

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यजु और साम ) को पढ़े। अर्थात् १२ वर्षों तक एक वेद की शाखा का विधान है। १८ वर्षों में या ९ वर्षों में भी तीनों वेद पढ़े जा सकते हैं। अर्थात् ६ या ३ वर्षों में एक वेद की शाखा को समाप्त करे।

वेदान्धीत्य वेदो वा, वेदं चापि यथा क्रमम्।

अविष्णुतो ब्रह्मचर्या, गृहस्थाश्रममावसेत् ॥

तीन, दो या एक वेद विधि-पूर्वक पढ़कर अखण्डित ब्रह्मचर्य से गृहस्थाश्रम में पैर रखे।

३६ वर्षों में वेद पढ़ना उत्तम १८ वर्षों में मध्यम और ९ वर्षों में अधम माना गया है। ब्रह्मचर्यावस्था में ३, २ या १ वेद को अवश्य पढ़ लेना चाहिये।

२२—ब्रह्मचारी-वेद

“ब्रह्मचारी चरति वेदपिप्त्रिषः। स देवानां भवत्येकमङ्गम् ॥”

(ऋग्वेद)

ब्रह्मचारी उत्तम कर्मों के साथ अपने व्रत का पालन करता है। अतएव वह देवों का एक अङ्ग बन जाता है।

“ब्रह्मचारी समिधा मेखलया अमेघ लोकांस्तपसा पिपत्तिं।”

(अथर्ववेद)

ब्रह्मचारी अपनी विद्या, कठिनश्रद्धा, परिश्रम-शीलता और सहिष्णुता से संसार का चपकार करता है।

गुरुकुल के वास-वेद से ब्रह्मचर्य के दो प्रकार होते हैं। उप-कुर्ब्या, और ‘नैष्ठिक’। इसलिये ब्रह्मचारी भी दो प्रकार के ठहरे।