भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचारी-भेद

उपकुर्वाण की अवस्था एक नियमित काल तक रहती है । उसकी समाप्ति हो जाने पर, गृहस्थाश्रम में पदार्पण किया जा सकता है । ब्रह्मचर्य-पालन, गुरु-सेवा, विद्याध्ययन के पश्चात् गुरु-दक्षिणा देने तक, वह ब्रह्मचारी उपकुर्वाण कहलाता है ।

“अविष्णुत ब्रह्मचर्यो, गृहस्थाश्रममावसेत् ।”

( धर्माचार्य भट्ट )

अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन कर लेने पर गृहस्थाश्रम में वास करे ।

अब हम उपकुर्वाण ब्रह्मचारी के शास्त्रोक्त कर्तव्य-कर्मों का वर्णन करते हैं । इनके पालन से ही वह अपने महाव्रत में सिद्धि पा सकता है:—

१—गुरु की आहा का पालन तथा उसकी सेवा करता रहे ।

२—मन लगाकर विद्याध्ययन करने में सावधान रहे ।

३—भिन्ना सांगिकर सात्विक प्रकार से अपना जीवन निर्वाह करे ।

४—ब्रह्मचर्य-रक्षा के लिये सदैव उपाय करता रहे ।

५—अपनी उन्नति का सर्वदा मनन और चिन्तन किया करे ।

जो ब्रह्मचारी अपने व्रत के महत्व को समझ लेता है—जिसका मन वेदाध्ययन से संयमित बन जाता है—जिसकी इच्छा प्रकृति के अतुराग में लग जाती है—ज्ञान देने के कारण गुरु ही जिसका सर्वस्व हो जाता है और संसार से वैराग्य हो जाता है—वह जीवन पर्यन्त ब्रह्मचारी रहता है । उसकी नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहते हैं । उसके लिये यह आहा है:—

“न विवाहो न सन्यासो, नैष्ठिकस्य विधीयते ।”

( महामान्य-धारत )