ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिये न तो विवाह और न सन्यास का विधान है।
अब इस नैष्ठिक ब्रह्मचारी के उन कर्तव्य-कर्मों का वर्णन कर देना चाहते हैं, जिनसे उनका जन्म सार्थक होता है:—
१—गुरु के सत्सङ्ग में ब्रह्मचर्य-पूर्वक विद्याध्ययन करता रहे।
२—गुरु के न रहने पर उसके विद्वान पुत्रों के समागम में आध्यात्मिक विचार करता रहे।
३—गुरु-पुत्रों के अभाव में उसकी पत्नी का पालन-पोषण धर्मयुक्त करता रहे।
४—यदि गुरु-पत्नी भी न हो, तो गुरु-कुल वासियों के साथ रहे।
५—सबके अभाव में यज्ञागृहान् करता रहे।
२३—गुरु-दक्षिणा-प्रकरण
“आचार्यों भूत्वा वरुणो यद्यदैच्छत प्रजापती।
तद्ब्रह्मचारी प्रायच्छत्सान् मित्रो अध्यात्मनः ॥”
(अथर्ववेद:)
आचार्य वरुण (सुखदायक) बनकर जनता के हितार्थ, जो दक्षिणा माँगता है, ब्रह्मचारी उसे अपने आत्मबल से मित्र (सहायक) होकर देता है।
“गुरु शुश्रूषा त्वैव, ब्रह्मलोकं समश्नुते।”
(भृद्धरथि)
गुरु की सेवा से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।