ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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गुरु-दक्षिणा-प्रकरण
गुरुकुल में विद्याध्ययन के समाप्त हो जाने पर, विद्यार्थी को घर जाने की आज्ञा मिलती है। उस समय वह अपने गुरु को सन्तुष्ट रखने के लिये उसकी इच्छा के अनुकूल, जो कुछ प्रदान करता है, उसको 'गुरु-दक्षिणा' कहते हैं। इस दक्षिणा का बड़ा महत्व है। प्रायः अनेक ग्रन्थों में इसका वर्णन मिलता है।
प्राचीन समय में गुरु-दक्षिणा शिष्टाचार का एक अङ्ग था। गुरु के उपकार के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने के लिये, ब्रह्मचारी उससे गुरु-दक्षिणा देने की प्रार्थना करता था। गुरु भी उसकी विनय-शीलता और आज्ञा-पालन से प्रसन्न हो कर उसे जनता के उपकार का आदेश देता था। यही उसकी दक्षिणा थी। और पहले के आचार्यों को किसी प्रकार की इच्छा या आवश्यकता नहीं रहती थी। गुरु की जो आज्ञा होती थी, उसे पालन करने की ब्रह्मचारी प्रतिज्ञा करता था, और उसका आशीर्वाद प्राप्त कर संसार में प्रविष्ट होता था।
शङ्कराचार्य के गुरु कुमारिल भट्ट ने अबेदिक-धर्म का खण्डन और सनातन-धर्म के मण्डन की दक्षिणा माँगी थी, जिसे उन्होंने (शंकराचार्य) जीवन भर पालन कर दिखाया। स्वामी दयानन्द के आचार्य विरजानन्द ने उन्हें जनता में वेद तथा सत्य-धर्म के प्रचार का आदेश किया था, जिसे उन्होंने पालन कर दिखाया।
गुरु-दक्षिणा ब्रह्मचारी के लिये एक अन्तिम कर्तव्य माना गया है। अतएव धर्मशास्त्र के अनुसार हम उसका भी वर्णन करते हैं:—
न पूर्णं गुरवे किञ्चिदुपकुर्वीत धर्मविद। स्नात्स्यन्तु गुरवाक्षतः, शक्त्यागुर्वर्धमाहरेत्॥