ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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तीसरे से चौथा, चौथे से पाँचवाँ, पाँचवें से छठवाँ, छठे से सातवाँ और सातवें से आठवाँ अत्यन्त भयङ्कर है। एक भी मैथुन में फँस जाने से मनुष्य सम्पूर्ण मैथुन में मृद्य हो जाता है। इनमें प्रत्येक मैथुन का अन्तिम परिणाम वीर्य-नाश होता है। इन मैथुनों के प्रभाव से वीर्य के कण अपने स्थान से विच्युत होकर अंगकोप में पहुँच जाते हैं, जो अवसर पाकर अवश्य बाहर हो जाते हैं। इसीलिये ब्रह्मचारी को चाहिये कि इन आठ प्रकार के मैथुनों से अपने ब्रह्मचर्य की रक्षा करता रहे।
हमारे मत से आठ प्रकार के मैथुनों से बँचने के लिये आठ प्रकार के संयम की आवश्यकता होती है। इसलिये जिन आठ प्रकार के सुसाधनों से ब्रह्मचर्य की रक्षा हो, वे भी ब्रह्मचर्य के ही समान हैं। अतः इस प्रकार आठ प्रकार के मैथुन करने के विरोधक भाव आठ प्रकार के ब्रह्मचर्य हैं। ब्रह्मचर्यावस्था में इन आठ प्रकार के ब्रह्मचर्य की भी अत्यन्त आवश्यकता है।
२१—वेदाध्ययन-विचार
“तस्माद्धेदव्रतानीह, चरेत्स्वाध्याय-सिद्धये।”
(हार्दतस्मृति)
ब्रह्मचारी को चाहिये कि अपने अध्ययन की सिद्धि पाने के लिये वेद में कहे गये नियमों का पालन करे।
“सदाधारं पृथिवीं दिवश्चास आचार्यं तपसा पिपत्ति।”
(यथर्ववेद)