भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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आष्ट मैथुन-निषेध

पतन्मैथुनमद्वद्वाः, प्रवदन्तिमनीषिणः । विपरीतं ब्रह्मचर्यं, मेतदेपाएलक्षणम् ॥

( दक्ष-संहिता )

स्मरण, कीर्तन, केलि, अवलोकन, गुप्त भाषण, सङ्कल्प, अश्व्यवसाय और क्रिया-निवृत्ति—ये मैथुन के आठ अङ्ग विद्वानों द्वारा निर्धारित किये गये हैं ।

इन आठ लक्षणों से परे रहना 'सिद्ध ब्रह्मचर्य' कहलाता है । १—स्मरण—प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष देखी या सुनी हुई खियों के रूप-लावण्य का ध्यान करना ।

२—कीर्तन—खियों के गुण, स्वरूप और सुख की कथा कहना, या तो तत्सम्बन्धी गान करना ।

३—केलि—खियों के साथ नाना प्रकार के खेल—जैसे, फाग आदि खेलना ।

४—प्रेक्षण—किसी स्त्री को काम-दृष्टि से बारबार देखना और सङ्केत करना ।

५—गुह्य भाषण—खियों के पास जा कर गुप्त रूप से भोगेच्छा प्रकट करने वाली बातें करना ।

६—सङ्कल्प—खियों को देख कर या उनके चरित्र सुन कर उनके पाने की धारणा मन में लाना ।

७—अश्व्यवसाय—खियों के सहवास में आनन्द का अनुमान कर उसके पाने के लिये प्रयत्न करना ।

८—क्रिया-निवृत्ति—खियों को मोह-जाल में फँस कर उनसे सम्भोग करना ।

इन आठ प्रकार के मैथुनों में पहले से दूसरा, दूसरे से तीसरा