ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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१०—अग्निहोत्र और सन्ध्या-वन्दन में शिष्यों को भी साथ ले लिया करे ।
११—ब्रह्मचारी को व्रत पालन के लिये उत्साहित करता रहे ।
१२—विद्यार्थियों के फार्थ और आपण से उनकी योग्यता की परीक्षा करता रहे ।
१३—आचार्य को लोभी, क्रोधी, विषयी, असत्य भापी, परनिन्दक, असहिष्णु और द्वेषी न होना चाहिये ।
१४—विना प्रभाव और स्नेह के शिष्यों को विद्वान् नहीं बनाया जा सकता ।
१५—ब्रह्मचारी को आह्लाकारी बना लेना उसका प्रथम कर्तव्य है ।
२०—अष्ट मैथुन-निषेध
“आयुर्वीर्यं यशस्वैव, हन्यतेऽब्रह्मचर्याया ।”
मैथुन ( ब्रह्मचर्य ) से आयु, वीर्य तथा यश की हानि होती है ।
ब्रह्मचर्य जैसे महाव्रत के नाश करनेवाले दुर्लुप्य का नाम ‘मैथुन’ है । मैथुन उस साधन को कहते हैं, जिससे किसी न किसी प्राकृतिक या अप्राकृतिक रूप से मनुष्य का वीर्य अपना स्थान छोड़ कर ज्ञात या अज्ञात अवस्था में बाहर निकल जाय । यही कारण है कि ब्रह्मचारियों के लिये शास्त्रों में मैथुन का निषेध किया गया है ।
स्वरूपं कीर्त्तनं केलिः, प्रेक्षणं गृह्य भाषणम् ।
सङ्कल्पोऽप्यवसायश्च, क्लिया-निष्पत्तिरेव च ॥