भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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आचार्य के कर्तव्य

दुष्ट शिष्य को ज्ञानोपदेश करने से आचार्य को कैसे यश प्राप्त हो सकता है !

प्राचीन समय से इस देश में आचार्य का बड़ा महत्व माना गया है ! गुरुकुल के अधिप्राप्ता होने के अतिरिक्त वह संसार का सुधारक है। मनुष्य-जाति का पतन और वस्थान का उत्तरदायित्व आचार्य पर है। बालक के लिये आचार्य से बढ़ कर कोई द्वितीय होता ही नहीं। ऐसे गुरुप के लिये भी शास्त्रों में कर्तव्य निर्धारित किये गये हैं। हम उनका सारांश यहाँ पर दे देना चाहते हैं:—

१—आचार्य को स्वयं प्रहचारी होना चाहिये।

२—उसे सब छात्रों पर सम दृष्टि रखना योग्य है।

३—ग्राह्यचारियों के स्वार्थ्य और सदाचार पर पूर्ण रूप से ध्यान रखे।

४—अपने छात्रों से अधिकार के बाहर काम न ले।

५—नियमित वित्तियों से अधिक अनध्याय (छुट्टी) की आज्ञा न दे।

६—विद्यार्थी की उत्पत्ति-कामना के लिये निरन्तर उद्योग करता रहे।

७—आचार्य-पुत्र, सेवक, ज्ञानदाता, धार्मिक, पवित्र, शास्त्रिक, बलवान्, धनदाता, सरल स्वभावी और रज्जातीय—ऐसे दस प्रकार के शिष्य को पढ़ाना कर्तव्य है।

८—जिस विषय में उसे सन्देह हो, उसे बिना समझे विद्यार्थी को न पढ़ावे।

९—अज्ञानत विचर होने के समय में कभी शिवा न दे।