ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 183, कुल 380 में से
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ब्रह्मचारी को चाहिये कि नियम के साथ अध्ययन किया करे। क्योंकि बिना नियम के पढ़ने से उसका कुछ फल नहीं मिलता।
अग्नीन्धनं भैक्षचर्यामिधः शून्यांगुरोर्हितम् ।
आसमाघर्त्तानात्कुर्यात्कृतोपनयनो द्विजः ॥
यज्ञोपवीत किया हुआ ब्रह्मचारी गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने तक यज्ञ की समिधा और भिक्षा लाने में, पृथ्वी पर सोने तथा गुरु का हित करने में, लगा रहे।
इन ऊपर कही गई बातों के अतिरिक्त और भी ब्रह्मचारी के कई कर्तव्य-कर्म इस प्रकार हैं:—
सूर्योदय से पहले उठ जाना—मित्य नियम से अध्ययन करना—पढ़ने के आदि और अन्त में गुरु को प्रणाम करना—सहपाठियों से प्रेम रखना—आचरण से गुरु को प्रसन्न रखना—अतिथियों का सत्कार करना—अवस्था में बड़े लोगों की—पहले माता-पितादि की सेवा करना, अभिवादन करना—अपने ब्रह्मचर्य का ध्यान रखना तथा साधुता और सरलता युक्त रहना ही कर्तव्य है।
१६—आचार्य के कर्तव्य
आचार्यां श्रुत्युर्वरुणः सोम श्लोषधयः पयः ।”
(अथर्ववेद)
आचार्य शिष्य के लिये पापनाशक, शान्तिदाता, जीवन सुधारक, रोग-निवारक और ज्ञान का उपदेशक होता है।
“कुशियम्भ्यापयतः कुतो यशः ।”