ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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तीसरे से चौथा, चौथे से पाँचवाँ, पाँचवें से छठवाँ, छठे से सातवाँ और सातवें से आठवाँ अत्यन्त भयङ्कर है। एक भी मैथुन में फँस जाने से मनुष्य सम्पूर्ण मैथुन में मृद्य हो जाता है। इनमें प्रत्येक मैथुन का अन्तिम परिणाम वीर्य-नाश होता है। इन मैथुनों के प्रभाव से वीर्य के कण अपने स्थान से विच्युत होकर अंगकोप में पहुँच जाते हैं, जो अवसर पाकर अवश्य बाहर हो जाते हैं। इसीलिये ब्रह्मचारी को चाहिये कि इन आठ प्रकार के मैथुनों से अपने ब्रह्मचर्य की रक्षा करता रहे।
हमारे मत से आठ प्रकार के मैथुनों से बँचने के लिये आठ प्रकार के संयम की आवश्यकता होती है। इसलिये जिन आठ प्रकार के सुसाधनों से ब्रह्मचर्य की रक्षा हो, वे भी ब्रह्मचर्य के ही समान हैं। अतः इस प्रकार आठ प्रकार के मैथुन करने के विरोधक भाव आठ प्रकार के ब्रह्मचर्य हैं। ब्रह्मचर्यावस्था में इन आठ प्रकार के ब्रह्मचर्य की भी अत्यन्त आवश्यकता है।
२१—वेदाध्ययन-विचार
“तस्माद्धेदव्रतानीह, चरेत्स्वाध्याय-सिद्धये।”
(हार्दतस्मृति)
ब्रह्मचारी को चाहिये कि अपने अध्ययन की सिद्धि पाने के लिये वेद में कहे गये नियमों का पालन करे।
“सदाधारं पृथिवीं दिवश्चास आचार्यं तपसा पिपत्ति।”
(यथर्ववेद)
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वेदाध्ययन-विचार
ब्रह्मचारी भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान को धारण करता है; वह अपने इस तप से आचार्य की प्रसन्नता का कारण होता है।
ब्रह्मचर्याश्रम और वेदाध्ययन का बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है। गुरुकुल में मेजने का अभिप्राय ही यह है कि बालक वेद की शिखा प्राप्त करे। सुबोध आचार्य की संरक्षकता में वेदों के ज्ञान ने का विधान शास्त्रकारों ने किया है। ब्रह्मचारी होने का प्रयत्न सदैव वेदाश्रम माना गया है।
यह बात सब को विदित है कि वेदों में सब प्रकार की विचार्य, मनुष्य-जाति को सुख देने वाली भरी हुई हैं। इस भूम-गंडल में वैदिक साहित्य सब से श्रेष्ठ और प्राचीन माना गया है। जो वेदों का ज्ञान प्राप्त करले, उसे विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं रह जाती। उसके लिये सब सुलभ हो जाता है। हमारे ऋषि-मुनि लोग इन्हीं वेदों के चल पर देश तथा धर्म की रक्षा और उद्धार करते थे।
गुरुकुलों में आचार्य, वेद तथा उसके परिचय कराते वाले वेदाङ्गों का परिचय करा देता था। जैसे सूर्य का प्रकाश धारण कर चन्द्रमा प्रकाशित होता है, वैसे ही शिष्य भी अपने गुरु से ज्ञानार्जन कर कुल और जाति को आनन्दित करता है। वास्तव में वेदाध्ययन का प्रयोजन यही है कि गृहस्थाश्रम सुखमय बने।
अब हम आचार्य मनु के मत से वेदाध्ययन के काल और प्रकार का वर्णन कर देना चाहते हैं:—
पद्म त्रिशद्वान्दिकं चर्यं, गुरोः त्रैवेदिकं व्रतम्।
तदधिकं पादिकंवा, ग्रहणान्निक्त मेव वा॥
गुरुकुल में ब्रह्मचर्य से रहकर, ३६ वर्ष में तीनों वेदों (ऋगु,
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ब्रह्मचर्य-विधान
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यजु और साम ) को पढ़े। अर्थात् १२ वर्षों तक एक वेद की शाखा का विधान है। १८ वर्षों में या ९ वर्षों में भी तीनों वेद पढ़े जा सकते हैं। अर्थात् ६ या ३ वर्षों में एक वेद की शाखा को समाप्त करे।
वेदान्धीत्य वेदो वा, वेदं चापि यथा क्रमम्।
अविष्णुतो ब्रह्मचर्या, गृहस्थाश्रममावसेत् ॥
तीन, दो या एक वेद विधि-पूर्वक पढ़कर अखण्डित ब्रह्मचर्य से गृहस्थाश्रम में पैर रखे।
३६ वर्षों में वेद पढ़ना उत्तम १८ वर्षों में मध्यम और ९ वर्षों में अधम माना गया है। ब्रह्मचर्यावस्था में ३, २ या १ वेद को अवश्य पढ़ लेना चाहिये।
२२—ब्रह्मचारी-वेद
“ब्रह्मचारी चरति वेदपिप्त्रिषः। स देवानां भवत्येकमङ्गम् ॥”
(ऋग्वेद)
ब्रह्मचारी उत्तम कर्मों के साथ अपने व्रत का पालन करता है। अतएव वह देवों का एक अङ्ग बन जाता है।
“ब्रह्मचारी समिधा मेखलया अमेघ लोकांस्तपसा पिपत्तिं।”
(अथर्ववेद)
ब्रह्मचारी अपनी विद्या, कठिनश्रद्धा, परिश्रम-शीलता और सहिष्णुता से संसार का चपकार करता है।
गुरुकुल के वास-वेद से ब्रह्मचर्य के दो प्रकार होते हैं। उप-कुर्ब्या, और ‘नैष्ठिक’। इसलिये ब्रह्मचारी भी दो प्रकार के ठहरे।
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ब्रह्मचारी-भेद
उपकुर्वाण की अवस्था एक नियमित काल तक रहती है । उसकी समाप्ति हो जाने पर, गृहस्थाश्रम में पदार्पण किया जा सकता है । ब्रह्मचर्य-पालन, गुरु-सेवा, विद्याध्ययन के पश्चात् गुरु-दक्षिणा देने तक, वह ब्रह्मचारी उपकुर्वाण कहलाता है ।
“अविष्णुत ब्रह्मचर्यो, गृहस्थाश्रममावसेत् ।”
( धर्माचार्य भट्ट )
अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन कर लेने पर गृहस्थाश्रम में वास करे ।
अब हम उपकुर्वाण ब्रह्मचारी के शास्त्रोक्त कर्तव्य-कर्मों का वर्णन करते हैं । इनके पालन से ही वह अपने महाव्रत में सिद्धि पा सकता है:—
१—गुरु की आहा का पालन तथा उसकी सेवा करता रहे ।
२—मन लगाकर विद्याध्ययन करने में सावधान रहे ।
३—भिन्ना सांगिकर सात्विक प्रकार से अपना जीवन निर्वाह करे ।
४—ब्रह्मचर्य-रक्षा के लिये सदैव उपाय करता रहे ।
५—अपनी उन्नति का सर्वदा मनन और चिन्तन किया करे ।
जो ब्रह्मचारी अपने व्रत के महत्व को समझ लेता है—जिसका मन वेदाध्ययन से संयमित बन जाता है—जिसकी इच्छा प्रकृति के अतुराग में लग जाती है—ज्ञान देने के कारण गुरु ही जिसका सर्वस्व हो जाता है और संसार से वैराग्य हो जाता है—वह जीवन पर्यन्त ब्रह्मचारी रहता है । उसकी नैष्ठिक ब्रह्मचारी कहते हैं । उसके लिये यह आहा है:—
“न विवाहो न सन्यासो, नैष्ठिकस्य विधीयते ।”
( महामान्य-धारत )
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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नैष्ठिक ब्रह्मचारी के लिये न तो विवाह और न सन्यास का विधान है।
अब इस नैष्ठिक ब्रह्मचारी के उन कर्तव्य-कर्मों का वर्णन कर देना चाहते हैं, जिनसे उनका जन्म सार्थक होता है:—
१—गुरु के सत्सङ्ग में ब्रह्मचर्य-पूर्वक विद्याध्ययन करता रहे।
२—गुरु के न रहने पर उसके विद्वान पुत्रों के समागम में आध्यात्मिक विचार करता रहे।
३—गुरु-पुत्रों के अभाव में उसकी पत्नी का पालन-पोषण धर्मयुक्त करता रहे।
४—यदि गुरु-पत्नी भी न हो, तो गुरु-कुल वासियों के साथ रहे।
५—सबके अभाव में यज्ञागृहान् करता रहे।
२३—गुरु-दक्षिणा-प्रकरण
“आचार्यों भूत्वा वरुणो यद्यदैच्छत प्रजापती।
तद्ब्रह्मचारी प्रायच्छत्सान् मित्रो अध्यात्मनः ॥”
(अथर्ववेद:)
आचार्य वरुण (सुखदायक) बनकर जनता के हितार्थ, जो दक्षिणा माँगता है, ब्रह्मचारी उसे अपने आत्मबल से मित्र (सहायक) होकर देता है।
“गुरु शुश्रूषा त्वैव, ब्रह्मलोकं समश्नुते।”
(भृद्धरथि)
गुरु की सेवा से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।
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गुरु-दक्षिणा-प्रकरण
गुरुकुल में विद्याध्ययन के समाप्त हो जाने पर, विद्यार्थी को घर जाने की आज्ञा मिलती है। उस समय वह अपने गुरु को सन्तुष्ट रखने के लिये उसकी इच्छा के अनुकूल, जो कुछ प्रदान करता है, उसको 'गुरु-दक्षिणा' कहते हैं। इस दक्षिणा का बड़ा महत्व है। प्रायः अनेक ग्रन्थों में इसका वर्णन मिलता है।
प्राचीन समय में गुरु-दक्षिणा शिष्टाचार का एक अङ्ग था। गुरु के उपकार के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने के लिये, ब्रह्मचारी उससे गुरु-दक्षिणा देने की प्रार्थना करता था। गुरु भी उसकी विनय-शीलता और आज्ञा-पालन से प्रसन्न हो कर उसे जनता के उपकार का आदेश देता था। यही उसकी दक्षिणा थी। और पहले के आचार्यों को किसी प्रकार की इच्छा या आवश्यकता नहीं रहती थी। गुरु की जो आज्ञा होती थी, उसे पालन करने की ब्रह्मचारी प्रतिज्ञा करता था, और उसका आशीर्वाद प्राप्त कर संसार में प्रविष्ट होता था।
शङ्कराचार्य के गुरु कुमारिल भट्ट ने अबेदिक-धर्म का खण्डन और सनातन-धर्म के मण्डन की दक्षिणा माँगी थी, जिसे उन्होंने (शंकराचार्य) जीवन भर पालन कर दिखाया। स्वामी दयानन्द के आचार्य विरजानन्द ने उन्हें जनता में वेद तथा सत्य-धर्म के प्रचार का आदेश किया था, जिसे उन्होंने पालन कर दिखाया।
गुरु-दक्षिणा ब्रह्मचारी के लिये एक अन्तिम कर्तव्य माना गया है। अतएव धर्मशास्त्र के अनुसार हम उसका भी वर्णन करते हैं:—
न पूर्णं गुरवे किञ्चिदुपकुर्वीत धर्मविद। स्नात्स्यन्तु गुरवाक्षतः, शक्त्यागुर्वर्धमाहरेत्॥
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ब्रह्मचर्यावस्था में धर्म का जाननेवाला, गुरु को कुछ भी न दे । पर ब्रह्मचर्य का पालन कर 'ज्ञातक' हो जाने पर वह जो आत्मा दे, यथाशक्ति उसे वह दक्षिणा दे ।
लेत्रं हिरण्यं गामश्चं, छत्रोपानहमासनम् । धान्यं शाकञ्च वासंसि, गुरुवे प्रीतिमावहेत्॥
पृथ्वी, सोना, गाय, अश्व, छाता, जूता, आसन, धान्य, शाक और वस्त्र—जो कुछ दे सकें, गुरु की प्रसन्नता के लिये समर्पित करें ।
जो ब्रह्मचारी ज्ञान प्राप्त कर लेने पर अपने आचार्य को उसकी माँगी हुई वस्तु देकर प्रसन्न करता है, उसकी विद्या में वृद्धि होती है, और उसी से जन-समाज का कल्याण-साधन हो सकता है ।
२४—समावर्त्तन-संस्कार
“स स्नातो वभुः पिङ्गलः पृथिव्यां बहु रोचते ।” (अथर्ववेद)
ब्रह्मचारी विद्या पढ़ लेने पर ज्ञातक होता है । इस प्रकार अत्यन्त तेजस्वी होकर संसार में सम्मान पाता है ।
“राज-स्नातक्योश्चैव, ज्ञातको रूपमान भाक् ।”
राजा और ज्ञातक दोनों में राजा की अपेक्षा ज्ञातक विशेष मान्य है ।
“गुरुवे दक्षिणां दद्यात्संयमी ग्राममावसेत् ।”
(हारीत-स्मृति)
वेदाध्ययन समाप्त होने पर गुरु को दक्षिणा देकर जितेन्द्रियता से ग्राम में निवास करें ।
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समावर्त्तन-संस्कार
उपनयन-संस्कार से ब्रह्मचर्याश्रम का प्रारम्भ और समावर्त्तन-संस्कार से उसकी समाप्ति होती है। उपनीत होकर ब्रह्मचारी गुरु-कुल में प्रविष्ट होता है, और स्नातक होकर उससे बाहर निकलता है। इस संस्कार में ब्रह्मचारी की तीर्थों के जल से स्नान कराय जाता है और तब से उसको 'स्नातक' कहा जाता है।
“सम्रह्मचारी यो विद्या-व्रत-स्नातः।”
(छन्दोग्योपनिषद्)
वह ब्रह्मचारी है, जिसने विद्याव्रत रूपी तीर्थों के जल में स्नान किया हो।
इस संस्कार के समय गुरु को यथा-शक्ति दक्षिणा दी जाती है, और गुरु उस ब्रह्मचारी के आयुर्वल, यशःप्रसार, ज्ञानगौरव और धनधान्य का आशीर्वाद देता है।
इस संस्कार से ब्रह्मचारी अपने आचार्य के संरक्षण से पृथक् होता है। अधिक समय के एक साथ रहने से दोनों में अत्यन्त अभिन्नता हो जाती है। अतएव मोह के धन्यन को तोड़ कर आचार्य उसे शुद्ध्याश्रम में जाने और अपना कर्तव्य पालन करने का उपदेश इस समय भी देता है:—
१—प्रमाद में पड़ कर ब्रह्मचर्य-व्रत का दुःखयोग न करना।
२—अपनी विद्या और वल से लोक-सेवा में सदा लगे रहना।
३—पञ्चमहायज्ञ में कभी प्रान्ति से असावधानी न करना।
४—माता-पिता तथा कुटुम्ब के भरण-पोषण को अपने हाथ में लेना।
५—सुयज्ञ उत्पन्न करने के लिये विधि-पूर्वक विवाह करना।
६—सदाचारी और उत्तम पुरुषों का सङ्ग करना।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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- ७—धर्म तथा धन का सन्धय करते रहना ।
- ८—अधर्ममूलक व्यवसाय में कभी न लिपटना ।
- ९—क्रोध, मोह, लोभ, भोग और दुर्घ से दूर ही रहना ।
- १०—गृहस्थाश्रम को नियत समय तक सुखमय बनाते रहना ।
२५—विवाह-विधान
“ब्रह्मचर्यं समाप्याथ, गृहधर्मं समाचरेत् ।”
ब्रह्मचर्याश्रम को समाप्त कर गृहस्थ-धर्म का पालन करना योग्य है ।
उद्धेत द्विजोभायां, सवर्णं लक्षणन्विताम् ।”
(मनुस्मृति)
स्नातक को चाहिये कि सवर्णों और मुलच्छियों वाली कन्या से विवाह करे ।
ब्रह्मचारी वीर्य-रक्षण सहित ज्ञानार्जन कर लेने पर, गुरु की आज्ञा से स्नातक होकर घर आता है । उस अवस्था में उसके पिता या उसके समान अधिकारी उसका सत्कार करते हैं । इसके अनन्तर विवाह का समय आता है । वर अपने सम्बन्धियों के साथ कन्या के पिता के यहाँ पहुँचता है । कन्या-पक्ष से उसका द्वार—पूजन (स्वागत) होता है, तदनन्तर ‘जनवास’ दिया जाता है । विवाह के विशिष्ट समय पर वर विवाह-मण्डप में जाता है । कन्या का पिता उसका ‘मनुषक’ अर्थात् उत्तम पदार्थों से सत्कार कर बैठता है । फिर अभिदेव का स्थापन कर वर, वधू का पाणि-भरण कर इस प्रकार कहता है—
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विवाह-विधान
मैं तुम्हें अपनी पत्नी बनाता हूँ। तू उत्तम सन्तान वाली हो। मेरे साथ तुम्हें भी दीर्घ जीवन प्राप्त हो। अर्थात् दिवों ने गृह-स्थाश्रम के लिये तुम्हें प्रदान किया है। तेरी शुभ दृष्टि हो—तुम्हें से पति का हित हो—पशुओं का कल्याण हो—तू मनोहर हृदय और नेत्रवाली हो। तेरे पुत्र जीवित और पुत्रपार्थी हों। तुम्हें से सब को सुख प्राप्त हो।
फिर वर वधू से ध्वन करता है और वह पत् के दीर्घ-जीवन एवं सम्बन्धियों के सुख की प्रार्थना करती है। तदनन्तर 'सप्तपदी' होती है। इसमें वर वधू को साथ लेकर सात बार फेरी करता है, और उससे अपने अनुकूल रहने की प्रतिज्ञा करता है। इसी समय से दोनों पति-पत्नी (दम्पति) बन जाते हैं। पश्चात् कन्या का पिता भी वर से निम्नलिखित प्रतिज्ञा करता है:—
यस्त्वया धर्मश्चरितव्यः सोऽनयासह ।
धर्मं चार्थं च कामे च, नाति चरितव्यं ॥
जो कुछ सत्कर्म करना हो, इस (कन्या) की सहकारिता सं करता—धर्म, अर्थ और काम मैं इसके विरुद्ध आचरण न करना।
इस पर वर भी उसकी बातों को जलपूर्वक इस प्रकार स्वीकार करता है:—
नाति चरामि, नातिचरामि नातिचरामि ।”
मैं कभी इसके विरुद्ध आचरण नहीं करूँगा—नहीं करूँगा और नहीं करूँगा !
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२६—गृहस्थ ब्रह्मचर्य
“ऋतुकालाभिगमनं, ब्रह्मचर्यमिवोच्यते ।”
ऋतु काल में स्त्री-प्रासङ्ग करना भी ब्रह्मचर्य के बराबर माना जाता है । विवाह सम्बन्ध में देखिये, भारत के आधुनिक राष्ट्र-निर्माता महात्मा गान्धी जी क्या कहते हैं:—
“विवाह स्नेच्छाचार ( असाधारिक मैथुन ) के लिये नहीं है । स्थूलियों में भी लिखा है कि दम्पति-नियम से रहते हुये, वै भी ब्रह्मचर्य का पालन कर सकते हैं ।”
विवाह मानवी स्तुति के चलाने के लिए एक धार्मिक तथा स्वामाविक कर्तव्य है । इसका विधिवत् पालन करने से गृहस्थाश्रम सुख और शान्ति का देने वाला होता है । इस के विरुद्ध जाने से दम्पति का जीवन अत्यन्त दुःख-कारक बन जाता है । विवाह का विधान बहुत प्राचीन तथा शास्त्रीय है । इसके उद्देश्य के सम्बन्ध में मनु महाराज यह आज्ञा देते हैं:—
“ऋणुजय विमुत्स्यै, धर्मणीत्पादयोत्पन्ना ।”
तीनों ऋणों ( देव, ऋषि तथा पित्रु ) के बन्धन से छूटने के लिये धर्म-पूर्वक प्रजा का उत्पादन करे ।
विवाह का उद्देश्य ही है कि धर्म-युक्त प्रजा उत्पन्न की जाय । गृहस्थाश्रम में भी पुरुष और स्त्री को संयम से रहने की शास्त्र में आज्ञा है । अब तो अज्ञानता के कारण गृहस्थाश्रम अत्यन्त दुःखित हो रहा है । सुप्रजा उत्पन्न करना तो दूर रहा, विवाह होते ही कामवासनाओं को उत्पन्न करने का उद्योग होने लगता है । इस कुवृत्ति की साधना में सन्तान हो जाय, तो हो जाय; पर इसका
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गृहस्थ ब्रह्मचर्य
ज्ञान किस को रहता है। हम बल-पूर्वक कहते हैं कि १५ शतक युवकों का गर्भाधान अनियमित रूप से होता है। इसे हम कैसे धर्म-पूर्वक कह सकते हैं। यही कारण है कि समाज की दिन पर दिन क्षीणता होती जाती है। अधर्म-युक्त प्रजा कभी अच्छी नहीं हो सकती। बहुत उचित कहा गया है:—
“सन्तानार्थेन मैथुनम्।”
केवल सन्तान उत्पन्न करने के लिये ही मैथुन का विधान है। गृहस्थाश्रम में भी ब्रह्मचर्य का विधान है। जो पुरुष नियत समय पर सन्तान को अभिलाषा से स्त्री का समागम करता है, वह भी ब्रह्मचारी है। ‘एकनारी ब्रह्मचारी’ ऐसी कहावत है। पर एकनारी रहने पर भी मनुष्य पर-स्वो सेवन न करने से भी न्य-भिचारी माना जा सकता है; शास्त्र को आहा है:—
“श्रुतीभ्यांमुपेयात्।”
श्रुतुकाल में भार्या का सेवन करना धर्म है। इसका अभि-प्राय यह है कि रजोदर्शन के पश्चात् स्त्रियाँ गर्भधारण कर सकती हैं। अन्य समय में केवल बीर्य-नाश होता है। इसलिये बाल-हत्या का महा पातक लगता है। मनु भगवान की आहा है:—
“ब्रह्मचार्येभ्य भवति, यत्रतत्राश्रमे वसन्।”
श्रुतुकाल की वजित रात्रियों को छोड़ कर स्त्री-सहवास करने वाला पुरुष जिस किसी आश्रम में हो—ब्रह्मचारी ही है। इस वचन से भी गृहस्थाश्रम में ब्रह्मचर्य का पालन करना योग्य है। स्त्री समागम के पश्चात् गर्भ के लक्षणों का ज्ञान हो जाने पर, सन्तानोत्पत्ति के तीन वर्ष पश्चात् पुनः गर्भाधान करने की
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शास्त्र-आज्ञा देता है। फिर भी अयोग्य पुरुष और अयोग्य स्त्री को तो मैथुन की आज्ञा ही नहीं है। शास्त्रों में कहे गये नियमों के अनुकूल गृहस्थाश्रम में ब्रह्मचर्य के पालन से मनुष्य की शारीरिक तथा मानसिक किसी प्रकार की हानि नहीं होती। गृहस्थ ब्रह्मचारी भी विद्वान्, श्रीमान् और कीर्तिमान् हो सकता है।
२७—सदाचार की सौ शिष्टाग्यें
अब हम इस शीर्षक के नीचे उन शिष्टाग्यों को देते हैं, जिन का पालन करने से गृहस्थाश्रम सुखमय बनाया जा सकता है:—
१—जो परमात्मा को सर्वदर्शी और अपने हृदय में रहने-वाला समझता है, वह पाप नहीं करता।
२—अभिमान करनेवाला पुरुष बहुत थोड़े दिनों में नाश को प्राप्त होता है।
३—इश्वर केवल हमारे सुकर्मों में सहायता करता है। वह किसी के कुकर्म का सहजी नहीं।
४—वह परमेश्वर सब निराशों की आशा है। इसलिये उसे किसी भी अवस्था में भूलना योग्य नहीं।
५—जिसके हृदय में सद्भावना है, वह पुरुष कभी दुःखी नहीं हो सकता।
६—मानसिक ऊष्णरणयें ही हमारे पतनका कारण बनती हैं।
७—जो कार्य जितनी ही दृढ़ता और सुचारुता से किया जाता है, उसमें उतनी ही सफलता भी मिलती है।
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सदाचार की सौ शिक्षाएँ
८—एक कर्तव्यशील मूढ़ भी एक अकर्तव्यशील विद्वान् से श्रेष्ठ है।
९—मनुष्य अपने उन्नत स्वभाव से ही अपने को उच्च पद पर नियुक्त करा सकता है।
१०—धन और खारण्य से भी सदाचार का मूल्य अधिक माना गया है।
११—सज्जनता का चिन्ह उस मनुष्य के सद्व्यवहार से प्रकट होता है।
१२—अपनी मानसिक सद्वृत्तियों को उन्नत तथा सुदृढ़ बनाने के लिये सदा-चेष्टा करनी चाहिये।
१३—अपने गुणों के प्रभाव से पुरुष सबसे पूजित होता है। वास्तव में गुण ही पूजा का स्थान है।
१४—चरित्र-गठन के लिये आदर्श पुरुषों का अनुकरण करना चाहिये।
१५—सबरित्रता और सद्व्यवहार से मनुष्य समाज और राज्य में महान् बनता है।
१६—अच्छे ग्रन्थों के पढ़ने से उत्तम लाभ नहीं होता, जितना कि उनमें कहीं गई बातों के पालन करने से होता है।
१७—मनुष्य-जीवन का उद्देश्य सुख और सततन्त्रता है। इसी के लिये अनेक साधन किये जाते हैं।
१८—जीवन में उसी को अच्छी सफलता मिलती है, जो पुरुष बाल्यावस्था से ही अच्छे नियमों का अभ्यास करता है।
१९—ज्ञान के लिये सत्संग से काम लेना चाहिये।
महात्म्य-विज्ञान
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२०—जो अपने सच्चरित्र से जनता को उपदेश देकर ऊपर उठाता है, वही महापुरुष कहलाने योग्य है ।
२१—विद्या के साथ साथ नम्रता और सरलता होने से सोने में सुगन्धि हो जाती है ।
२२—वही विद्वान् पुरुष है, जो दूसरों को श्रविषा से बुझाने का उद्योग करे ।
२३—सत्यता और स्पष्टवादिता से मनुष्य की स्वाधीनता का ज्ञान होता है ।
२४—जो अपने मानसिक विचारों का स्वयं दास है, वह कभी उदार और उच्च नहीं हो सकता ।
२५—बहुत विचार करने पर थोड़ा कार्य करना वचित है ।
२६—नर-रत्नों को अपने सिद्धान्त से यमराज भी नहीं डगा सकते ।
२७—अपनी प्रतिष्ठा और रीति को सदैव निमाने का प्रयत्न करना चाहिये ।
२८—धर्म और ईश्वर से डरना चाहिये और पाप तथा दुष्टों से कभी न भय खाना चाहिये ।
२९—निष्कलङ्क चरित्र, उच्च विचार और सरल व्यवहार से बढ़ कर इस संसार में कुछ है ही नहीं ।
३०—सुख की इच्छा सबको है, पर उसके साधने के उपाय को कार्य-रूप में लाने में बहुत से लोग पीछे हट जाते हैं ।
३१—निर्धनता और हीनता में भी कभी असत्य से लाभ न उठाना चाहिये ।
३२—अपने आत्मा के प्रतिकूल चलना बड़ा भारी पाप है ।
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सदाचार की सौ शिल्पियाँ
३३—दुष्टों की निन्दा से डर कर अपना सुकार्य या विचार न छोड़ना ही सत्साहस है ।
३४—मधुर वचन से सारा संसार वश किया जा सकता है ।
३४—सदाचारी और स्थाय-स्वागी पुरुष को ही सम्पत्ति मिलती है ।
३५—स्वात्माभिमानी और पवित्र हृदयी पुरुष निर्धन होने पर भी सर्व-श्रेष्ठ गिना जाता है ।
३६—श्रमशीलता, कर्तव्यनिष्ठा और नियमबद्धता से ही प्रतिभा उत्पन्न होती है ।
३७—विद्यार्थियों के लिये उनका सब से बड़ा गुण सरल तथा शुद्ध जीवन है ।
३८—एक क्षण भी समय व्यर्थ न खोना चाहिये । समय का आश्रय लेकर कार्य-साधन करना ही योग्य है ।
३९—आडम्बर शून्य और सन्तोषी व्यक्ति बनने से ही शान्ति प्राप्त हो सकती है ।
४०—सदाचारी विद्यार्थी का शारीरिक और मानसिक तेज बढ़ता जाता है ।
४१—जीवन को सुविधा-सम्पन्न बनाने के लिये बुद्धिमान को चाहिये कि सतत परिश्रम करता रहे ।
४२—विद्याध्ययन और पुरय के सन्ध्य में जो समय लगता है, वह फलद और सार्थक है ।
४३—परोपकार और जाति-सेवा ही मनुष्यता का रूप है । इसके लिये सदा कटिबद्ध रहना धर्म है ।
गहनचर्य-विद्वान
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४४—ज्ञान और बल की सदा उपासना करनी चाहिये। .योंकि संसार में सब कुछ इन्हीं की सत्ता का हेतु है।
४५—सत्पुरुष और प्रेमी पुरुष दुःख में भी कभी दया और प्रेम नहीं छोड़ते।
४६—उदार और बुद्धिमान वैरी भी मित्रता के योग्य माना जाता है।
४७—न्याय, स्नेह, उत्साह, कर्तव्य, बुद्धि, विद्या और प्रेम जिस पुरुष में है, वह देव-सुख है।
४८—बहुत विचार कर मित्रता करनी चाहिये। सच्चे मित्रों से बढ़ कर संसार में कुछ भी सुख नहीं है।
४९—कुल की सुखीति तथा अपने अधिकारों की सदा रक्षा करनी चाहिये।
५०—देश, काल तथा पात्र का विचार करने वाला पुरुष सदा आनन्द की वंशी बजाता है।
५१—अपने दोषों का अनुभव होते ही उन्हें छोड़ने का प्रयत्न करना कर्तव्य है।
५२—जो लोग हठ-बश उचित बातों को नहीं मानते, वे अन्त में काम बिगाड़ कर पड़ताते हैं।
५३—जब तक कुछ भी आशा है, उद्योग से हाथ न धो बैठना चाहिये।
५४—किसी से कभी वैर न करना ही परम चतुरता है।
५५—अत्यन्त कष्ट में भी धीरज का न छोड़ने वाला ही बिजयी होता देखा गया है।
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सवाचार की सौ शिक्षायें
५६—अभिय चचन कहने वाला पुरुष, सब के हृदय का काँटा बन जाता है।
५७—खलों से सर्वदा दूर रहना चाहिये।
५८—शास्त्रों के उद्देश्यों को न मानने वाला मनुष्य जीवन भर रोता रहता है।
५९—पितृ, माता और आचार्य से सदा अपने हित की बात पूछनी चाहिये।
६०—भविष्य का विचार कर वर्तमान कार्य करने वाला पुरुष सीधा मार्ग पा जाता है।
६१—पुरुष के लिये एक पद्मोत्तम और स्त्री के लिये पतिव्रत ही सनातन और वैदिक धर्म है।
६२—अच्छे कर्मों के लिये कभी न मुख मोड़ना चाहिये। समय की गति कभी अनुकूल नहीं होती।
६३—जो परमार्थ में मन लगाता है, वह स्वार्थ भी सिद्ध कर सकता है। परमार्थ का पलड़ा स्वार्थ से बहुत भारी है।
६४—यदि आपके हाथ में अधिकार है, तो उसका सदुपयोग करना चाहिये।
६५—मुख से बही बात कहनी चाहिये, जो सुगमता से की जा सके।
६६—अपने अवगुणों पर कड़ा ध्यान रखना चाहिये। असावधानी से ये बढ़ जाते हैं, और मनुष्य को पतित कर देते हैं।
६७—उत्तम वस्तुओं और अच्छी शिक्षाओं का संग्रह करने वाला पुरुष, अवसर पड़ने पर अधीर नहीं होता।
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ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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६८—विचारशील और उत्तम पुरुष का नियम होता है कि वे सब की सौ सुनते हैं, पर अपनी एक ही करते हैं।
६९—भूतकाल के अपराधों पर परचात्ताप और भविष्य में वैसा न करने का प्रयत्न करना चाहिये।
७०—माता-पिता, गुरु तथा सज्जनों का आदर करने वाला बालक ही विद्वान हो सकता है।
७१—नित्य नियम से विद्याभ्यास करने से शीघ्र सफलता मिलती है।
७२—जो बाल्यावस्था में विद्या और युवावस्था में धन नहीं एकत्र कर लेता, वह ध्रुवता में बड़ा दुःख पाता है।
७३—बहुत सी बातों और ग्रन्थों के सुनने-देखने से अनुभव बढ़ता है।
७४—आत्म-मर्यादा कभी न खोनी चाहिये। यही पुरुष को सुख देती है।
७५—असफलता के कारण सत्कार्य का छोड़ना केवल कायरता है।
७६—यह जीवन एक प्रकार का युद्धक्षेत्र है, यहाँ वही विजयी हो सकता है, जो अपने कर्म-धर्म में सदा तत्परता दिखाता सके।
७७—विद्या पढ़ने का अभिप्राय गुणों का संग्रह करना है। इससे परे अविद्या है।
७८—जिस जाति और जिस देश में जन्म हुआ है, उसके लिये कुछ न करना कृतज्ञता है।
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सदाचार की सौ शिल्पावें
५९—किसी प्रकार का अभ्यास करने से वह बढ़ता है, और न करने से घटता है। अभ्यासी शिष्य निरभ्यासी गुरु से बढ़ जाता है।
८८—काम और क्रोध, ये दोनों नरक में गिराते हैं। अतः सदा इन्हें दवाना चाहिये।
८९—किसी को दुर्बचन न कहना चाहिये। कड़ी बात बर्खा की भाँति हृदय में जुम जाती है।
८२—पुरुषार्था-उत्साही पुरुष कभी दरिद्री नहीं हो सकता और अगलसी निरुत्साही मनुष्य कभी धनी नहीं हो सकता।
८३—यदि परमात्मा ने विद्या, शक्ति और धन दिया है तो अज्ञानी, निर्बल और दीन के लिये लगादो।
८४—अपने कुटुम्ब में अनेक्य न होने देने में ही सबका करवाण है।
८५—प्रिय होने पर भी वे वस्तुयें त्याज्य हैं, जिनसे किसी प्रकार की मानसिक या शारीरिक हानि होती है।
८६—अपनी सत्कीर्ति को कभी मूलकर भी मैली न होने देने वाला ही पुरुष कुल का रत्न है।
८७—अनधिकार चेष्टा करना व्यर्थ है। अधिकारी को कुछ भी दुर्लभ नहीं।
८८—श्रेष्ठ पुरुष अपनी सरलता और सज्जनता से कभी घृष्य नहीं होते। यही उनकी श्रेष्ठता का मूल कारण है।
८९—दयालु और परोपकारी व्यक्ति का ही जीवन सार्थक होता है।
९०—गुरु में भी यदि कुछ गुण हों तो उसे ले लेना ही बुद्धिमत्ता है।