भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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महात्म्य-विज्ञान

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२०—जो अपने सच्चरित्र से जनता को उपदेश देकर ऊपर उठाता है, वही महापुरुष कहलाने योग्य है ।

२१—विद्या के साथ साथ नम्रता और सरलता होने से सोने में सुगन्धि हो जाती है ।

२२—वही विद्वान् पुरुष है, जो दूसरों को श्रविषा से बुझाने का उद्योग करे ।

२३—सत्यता और स्पष्टवादिता से मनुष्य की स्वाधीनता का ज्ञान होता है ।

२४—जो अपने मानसिक विचारों का स्वयं दास है, वह कभी उदार और उच्च नहीं हो सकता ।

२५—बहुत विचार करने पर थोड़ा कार्य करना वचित है ।

२६—नर-रत्नों को अपने सिद्धान्त से यमराज भी नहीं डगा सकते ।

२७—अपनी प्रतिष्ठा और रीति को सदैव निमाने का प्रयत्न करना चाहिये ।

२८—धर्म और ईश्वर से डरना चाहिये और पाप तथा दुष्टों से कभी न भय खाना चाहिये ।

२९—निष्कलङ्क चरित्र, उच्च विचार और सरल व्यवहार से बढ़ कर इस संसार में कुछ है ही नहीं ।

३०—सुख की इच्छा सबको है, पर उसके साधने के उपाय को कार्य-रूप में लाने में बहुत से लोग पीछे हट जाते हैं ।

३१—निर्धनता और हीनता में भी कभी असत्य से लाभ न उठाना चाहिये ।

३२—अपने आत्मा के प्रतिकूल चलना बड़ा भारी पाप है ।