ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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सदाचार की सौ शिल्पियाँ
३३—दुष्टों की निन्दा से डर कर अपना सुकार्य या विचार न छोड़ना ही सत्साहस है ।
३४—मधुर वचन से सारा संसार वश किया जा सकता है ।
३४—सदाचारी और स्थाय-स्वागी पुरुष को ही सम्पत्ति मिलती है ।
३५—स्वात्माभिमानी और पवित्र हृदयी पुरुष निर्धन होने पर भी सर्व-श्रेष्ठ गिना जाता है ।
३६—श्रमशीलता, कर्तव्यनिष्ठा और नियमबद्धता से ही प्रतिभा उत्पन्न होती है ।
३७—विद्यार्थियों के लिये उनका सब से बड़ा गुण सरल तथा शुद्ध जीवन है ।
३८—एक क्षण भी समय व्यर्थ न खोना चाहिये । समय का आश्रय लेकर कार्य-साधन करना ही योग्य है ।
३९—आडम्बर शून्य और सन्तोषी व्यक्ति बनने से ही शान्ति प्राप्त हो सकती है ।
४०—सदाचारी विद्यार्थी का शारीरिक और मानसिक तेज बढ़ता जाता है ।
४१—जीवन को सुविधा-सम्पन्न बनाने के लिये बुद्धिमान को चाहिये कि सतत परिश्रम करता रहे ।
४२—विद्याध्ययन और पुरय के सन्ध्य में जो समय लगता है, वह फलद और सार्थक है ।
४३—परोपकार और जाति-सेवा ही मनुष्यता का रूप है । इसके लिये सदा कटिबद्ध रहना धर्म है ।