भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 204

२०१

सवाचार की सौ शिक्षायें

५६—अभिय चचन कहने वाला पुरुष, सब के हृदय का काँटा बन जाता है।

५७—खलों से सर्वदा दूर रहना चाहिये।

५८—शास्त्रों के उद्देश्यों को न मानने वाला मनुष्य जीवन भर रोता रहता है।

५९—पितृ, माता और आचार्य से सदा अपने हित की बात पूछनी चाहिये।

६०—भविष्य का विचार कर वर्तमान कार्य करने वाला पुरुष सीधा मार्ग पा जाता है।

६१—पुरुष के लिये एक पद्मोत्तम और स्त्री के लिये पतिव्रत ही सनातन और वैदिक धर्म है।

६२—अच्छे कर्मों के लिये कभी न मुख मोड़ना चाहिये। समय की गति कभी अनुकूल नहीं होती।

६३—जो परमार्थ में मन लगाता है, वह स्वार्थ भी सिद्ध कर सकता है। परमार्थ का पलड़ा स्वार्थ से बहुत भारी है।

६४—यदि आपके हाथ में अधिकार है, तो उसका सदुपयोग करना चाहिये।

६५—मुख से बही बात कहनी चाहिये, जो सुगमता से की जा सके।

६६—अपने अवगुणों पर कड़ा ध्यान रखना चाहिये। असावधानी से ये बढ़ जाते हैं, और मनुष्य को पतित कर देते हैं।

६७—उत्तम वस्तुओं और अच्छी शिक्षाओं का संग्रह करने वाला पुरुष, अवसर पड़ने पर अधीर नहीं होता।

१२