भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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६८—विचारशील और उत्तम पुरुष का नियम होता है कि वे सब की सौ सुनते हैं, पर अपनी एक ही करते हैं।

६९—भूतकाल के अपराधों पर परचात्ताप और भविष्य में वैसा न करने का प्रयत्न करना चाहिये।

७०—माता-पिता, गुरु तथा सज्जनों का आदर करने वाला बालक ही विद्वान हो सकता है।

७१—नित्य नियम से विद्याभ्यास करने से शीघ्र सफलता मिलती है।

७२—जो बाल्यावस्था में विद्या और युवावस्था में धन नहीं एकत्र कर लेता, वह ध्रुवता में बड़ा दुःख पाता है।

७३—बहुत सी बातों और ग्रन्थों के सुनने-देखने से अनुभव बढ़ता है।

७४—आत्म-मर्यादा कभी न खोनी चाहिये। यही पुरुष को सुख देती है।

७५—असफलता के कारण सत्कार्य का छोड़ना केवल कायरता है।

७६—यह जीवन एक प्रकार का युद्धक्षेत्र है, यहाँ वही विजयी हो सकता है, जो अपने कर्म-धर्म में सदा तत्परता दिखाता सके।

७७—विद्या पढ़ने का अभिप्राय गुणों का संग्रह करना है। इससे परे अविद्या है।

७८—जिस जाति और जिस देश में जन्म हुआ है, उसके लिये कुछ न करना कृतज्ञता है।