भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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मृगचर्य-विज्ञान

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जो हमारे अच्छे आचरण हों, उनका अनुकरण करना। कुचरियों का नहीं !

ये, के चासमच्छेया ५ सो ब्राह्मणस्तेषां त्वयासनेन प्रभव- सितव्यम् ।

जो लोग हममें उत्तम ब्राह्मणानी हैं, वन्हीं के सत्सङ्ग का विद्यास करना !

अन्द्रया देवम् । अश्रद्धया देवम् । श्रिया देवम् । ह्रिया देवम् । भिया देवम् । सविदा देवम् ।

अद्वा से देना—अश्रद्धा से देना—शोभा से देना—लज्जा से देना—और प्रतिष्ठा से दान देना चाहिये ।

अथ यदि ते कर्म विचिकित्सा वा वृत्त विचिकित्सा वा स्यात् । ये तत्र ब्राह्मणाः सम्मर्धिनो युक्ता अयुक्ता अलुक्ता धर्म कामाः स्तुर्यथा ते तत्र वर्त्तन्तः, तथा तत्र वत्तथाः ।

कभी कर्म या ज्ञान सम्बन्धी संशय उपरिथत हो, तो ऐसी अवस्था में ब्राह्मणानी, पक्षपात-रहित, योगी, अयोगी, दयावार और धर्म के प्रेमी वहाँ जैसा आचरण करते हों, वैसा ही आचरण करना योग्य है ।

एष आदेशः, एष उपदेशः, एषा वेदोपनिषद् । पतदनुशास- नम् । एवमुपासितव्यम् । एवमुचेतदुपास्यम् ।

यही आशा है, यही उपदेश है तथा यही वेद और उपनिषद् की शिक्षा है । यही करना चाहिये । इसी प्रकार के सदाचार का पालन कर्तव्य है ।