भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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आचार्य के दिव्योपदेश

वेदरतुल्याचार्योंऽमन्तेषादिनि मनुष्यास्तिः—

आचार्य अपने ऋद्धाचारी शिष्य को इस प्रकार शिक्षा देता हैः—

सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः ।

है पुत्र ! तू सत्य बोलना । धर्म पर चलना और स्वाध्याय (पाठ) में प्रमाद न करना ।

आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सी ।

पूर्ण ऋद्धाचर्य से जिद्याध्ययन के समाप्त होने पर आचार्य को दक्षिणा देकर, सन्तानोत्पत्ति के लिये गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना।

सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् ।

प्रमाद-वश होकर सत्य से विमुख न होना, प्रमाद के कारण धर्म को न त्याग देना और प्रमाद-युक्त हो कर सत्कर्म को न खो बैठना ।

भृत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्याय प्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् । देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् ।

अपने ऐश्वर्य की वृद्धि में प्रमाद न करना—अपने पठन-पाठन में असावधानता मत करना और देव तथा पितरों के कार्य से विरक्त न होना ।

मातृदेवो भव । पितु देवो भव । आचार्य देवो भव । अतिथि देवो भव ।

अपने माता-पिता, आचार्य तथा अतिथि का सत्कार करना । यान्यनवधानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि । जां कर्म दीप-रहित हों, उनका पालन करना । दुष्कर्मों का कभी नहीं !

यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्थानि नो इतराणि ।