भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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कन्या और ब्रह्मचर्य

और पुरुषों की पाठशाला में पाँच वर्ष की बालिका न जाने पावे अर्थात् जब तक वे ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणी रहें, तब तक पुरुष या स्त्री के दर्शन, स्पर्श, एकान्त सेवन, भाषण, विषय-कथा, परस्पर-क्रीड़ा, विषय का ध्यान और सङ्ग—इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहें ।”

इस प्रकार कोई भी सज्जन और विचारशील पुरुष कन्याओं के ब्रह्मचर्य-व्रत और विद्याध्ययन का विरोध नहीं कर सकता ।

स्त्री के शरीर में साधारणतया १२ वर्ष की अवस्था में रज की उत्पत्ति हो जाती है और पुरुषों को प्रायः १५ वर्ष की अवस्था में वीर्यगम होता है । महर्षि शुश्रुत के मत से १६ वर्ष की कन्या और २५ वर्ष का बालक वीर्य के विचार से वराबर समका जाता है । रजोदर्शन और वीर्योत्पत्ति के उपरान्त का समय ही वास्तविक ब्रह्मचर्य-काल है । इससे पूर्व नहीं । इस प्रकार स्त्री के ब्रह्मचर्य के ३ वर्ष का समय पुरुष के ब्रह्मचर्य के ९ वर्षों के बराबर होता है । अर्थात् स्त्री का १ वर्ष का ब्रह्मचर्य पुरुष के ३ वर्ष के बराबर हुआ ।

३—ब्रह्मचारिणी का विवाह

“कन्यायां द्विगुणोवरः ।

(सूक्ति )

कन्या की अवस्था से उसका वर द्विगुण अवस्था का होना चाहिये ।

“कन्यानां सम्प्रदानञ्च, कुमारशास्त्रं रक्षणम् ।”

(मनुस्मृति)