भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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विद्या पढ़ाने का अभिप्राय साक्षर बनाने से नहीं है, बल्कि योग्य बनाने से है। वही कन्या विद्याध्ययन कर सकती है, जो ब्रह्मचर्य का पालन करे। जब तक वह ब्रह्मचारिणी तथा अविवाहितो है, सब तक वह नाना प्रकार की विद्यायें और कलायें सीख सकती है। गोमिल आदि गृह सूत्रों में भी कन्या के ब्रह्मचर्य की बात स्पष्ट रूप से आई है।

यवनों के आक्रमण-काल में कन्याओं को बचाने के लिये पाराशरी और शीघ्रकौष में “अष्ट वर्षा भवेद्वगोरी, नव वर्षा च रोहिणी” जैसे पाठ गढ़ दिये गये थे, जो आज तक प्रचलित हैं। इन फकिराओं के अनुकूल रजोदर्शन से पूर्व ही कन्याओं का विवाह हो जाता है और वे ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन से परे रह जाती हैं। हमारे शरीर-शास्त्र के जानने वाले महर्षि शुभ्रत ने भी कन्याओं को सोलह वर्ष तक के पहले विवाह करने के अयोग्य ठहराया है। अतएव जब तक वे अयोग्य हैं, ब्रह्मचर्य का पालन कर जानवती वनें। इसके उपरान्त सुयोग्य वर से उनका विवाह होना चाहिये।

हमारे विचार से तो कन्याओं के लिये ब्रह्मचर्य-पालन बालकों से भी नितान्त आवश्यक और शास्त्र-सम्मत है। क्योंकि उन पर संवातोत्पत्ति सम्बन्धी संसार का बड़ा भारी उत्तर-दायित्व है।

वर्तमान भारत के आचार्य स्वामी दयानन्द सरस्वती लिखते हैं—

“बालक और बालिकाओं की पाठशाला दो कोस, एक दूसरे से दूरहोनी चाहिये। बालकों की पाठशाला में अभ्यापक तथा भृत्य आदि सभी पुरुष हों, और बालिकाओं की पाठशाला में सभी स्त्रियाँ होनी चाहिये। स्त्रियों की पाठशाला में पाँच वर्ष का बालक