भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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ब्रह्मचारिणी का विवाह

कन्या ऋतुमती हो जाने पर ३ वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई, कुमारी रहे। इसके पश्चात् अपने योग्य ( ब्रह्मचारी युवक ) पति को बने।

श्रीणि वर्षार्ण्युत्तुमदी, कांक्षेतपितृशासनम्।

ततश्चतुर्ये वर्षंतु, विन्देत सहस्रं पतिम् ॥

( बौधायन )

ऋतुमती कन्या ३ वर्ष तक पिता के संरक्षण में ब्रह्मचर्य का पालन करे। तत्पश्चात् चौथे वर्ष में अपने ( वय और गुण में ) योग्य पति से परिणय करे।

अज्ञात् पति मर्यादामज्ञातपतितेखनाम्।

नांद्वाहयेतिपिता बालामक्षतां धर्मशासनम्॥

( हेमाद्रि )

पिता को चाहिये कि पति-मर्यादा, पति-सेवा और धर्म-शासन को न जाननेवाली तथा कम अवस्थावाली कन्या का विवाह न करे।

ततो वराय विदुषे, कन्या देया मतीपिभिः।

पपः सनातनः पन्थाः, ऋपिभिः परिगीयते ॥

जब कन्या ब्रह्मचर्य का पालन कर ले, तो उसे विद्वान् वर को समर्पित करना चाहिये। यही सनातन मार्ग है और इसे ही ऋपि लोग मानते आये हैं।

महु, व्यास, दक्ष, गौतम, शातातप, बौधायन तथा आयला-यन आदि सभी प्राचीन धर्मशास्त्री लोग कन्या के ब्रह्मचर्य के समर्थक और छोटी अवस्था के विवाह के जोर विरोधी हैं। सभी के मत से ब्रह्मचारिणी रह कर ही कन्या को विवाह के लिये