भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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आज्ञा दी गई है अर्थात् १५ वर्ष की आयु से पहले किसी ने भी कन्या के विवाह का समर्थन नहीं किया है।

ऋग्वेद में कन्या के विवाह के सम्बन्ध में एक प्रार्थना यह है कि हे अश्विनी कुमार ! आप ऐसी दया कीजिये जब कि एक कन्या ब्रह्मवादिनी और ब्रह्मचारिणी रह कर, स्त्री के सब लक्षणों से युक्त हो जाय और वह सौभाग्यशालिनी अपना विवाह करना चाहे तब उसे तेजस्वी, सुन्दर और युवक बन मिले। वह बन पुरुषार्थी हो। उसके घर में स्नेह, माधुर्य तथा सौन्दर्य आदि का वास हो। विविध प्रकार के अन्न और धन से परिपूर्ण हो। जहाँ दया, दान और परोपकार आदि गुणों का बाहुल्य हो और योगादि से रहित हो। अर्थात् उस स्त्री को सर्वगुणसम्पन्न युवावस्था को प्राप्त बन मिले।

विवाह का अभिप्राय पाठकों को पहले विदित ही हो चुका है। इसलिये जब तक वर-कन्या अयोग्य और ज्ञानहीन हैं, तब तक उनका विवाह करना परम मूर्खता और अनुचित पाप है।

४—ब्रह्मचारिणी देवियों

यादगुण्येन भर्जा स्त्री, संयुज्येत यथाविधि। तदगुण्या सा भवति, समुद्रयेन निक्षग्ना ॥ (मनुस्मृति)

स्त्री जैसे पति के साथ संयुक्त होती है, वैसे ही उसमें गुण आ जाते हैं। जैसे नदी समुद्र से मिलते ही उसके खारेपन को ग्रहण कर लेती है।

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