भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 216, कुल 380 में से

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ब्रह्मचारिणी देवियोंँ

आत्मानमात्मना यास्तु, रक्ष्युस्ताः सुरक्षिताः ।

( मनुस्मृति )

जो स्त्री स्वयं ही अपने सतीत्व की रक्षा करती है, वही सुरक्षित रह सकती है ।

पत्नी के लिये पति ही ब्रह्म है । उसके साथ नियमानुकूल आचरण करना ही ब्रह्मचर्य है । प्राचीन समय में इस हिन्दूजाति में अनेक सच्ची ब्रह्मचारिणी तथा सती देवियाँ हुई हैं । पुराणों तथा अन्य कथा-प्रधान ग्रन्थों में उनके दिव्य-चरित्रों का वर्णन मिलता है । यहाँ हम कुछ की संक्षिप्त कथायें लिखते हैं । आशा है हमारी पाठिकायें भी उनका अनुकरण कर लाभ उठावंगी ।

ब्रह्मवादिनी घोषा—यह कश्चिदान सुनि की कन्या और वपिज की पौत्री थीं । ऋग्वेद के दशम मण्डल के ३९,४० सूक्त इन्हीं पर श्रफट हुए थे । इन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया था और इसका उपदेश भी सबको करती थीं । इनके सिद्धान्तों का सार नीचे दिया जाता है—

जो पुरुष स्त्री की प्राण-रक्षा में तत्पर रहे, उसे यज्ञ-कार्य में नियुक्त करे, उस पर प्रगाढ़ प्रेम रखे, उससे उत्तम सन्तान उत्पन्न करे, पितृयज्ञ के योग्य बनावे इन गुणों वाला वर ब्रह्मचारिणी को प्राप्त हो । ऐसे ही पति के मिलने से स्त्रियों को सुख होता है ।

युवक स्वामी और युवती स्त्री के सहवास से जो आनन्द प्राप्त होता है उसे ब्रह्मचारिणी कन्यायें कुछ भी नहीं जान सकतीं । हे अविनी-कुमार ! वह विषय हमें समझोने, अब हम स्त्री पर प्रेम रखनेवाले बलवान् और वीर्यवान् पति के घर जाना चाहती हैं ।

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