ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य-विद्यान
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ब्रह्मवादिनी सूर्या—यह ब्रह्मवेद के दशम मण्डल के ८५ सूक्त की रचयित्री हुई है। यह सूक्त विवाह सम्बन्ध में वर्णित है। उनके उपदेशों का सार नीचे दिया जाता है:—
हे बहू! तेरे पति के घर में ऐसी बरघुर्ष प्राप्ति हो, जो प्रजा तथा लुम्के भिय लेंगे। इस गृह में तू स्वामिनी बनने के लिये जागृत हो! इस पति के साथ संसर्ग कर और अज्ञात परमात्मा को ध्यान में रख कर, दोनों बुद्धावस्था तक परस्पर जुलभोग कर ले रही।
हे परमात्मन, तू इस बधू को सुपुत्रवती और सौभाग्यवती बनाना। इसके गर्भ से १० सन्तान उत्पन्न करना और ग्यारहवें इसके पति को जीवित रखना। हे बहू, तू अपने सद्गुणवहार से ससुराल पर अधिकार जमाना, सास-ससुर को सेवा-शुश्रूषा से वश में रखना, ननदों पर राज्य करना और देवों पर महारानी की भौंति शासन करना।
ब्रह्मचारिणी गोधा—यह ब्रह्मचारिणी और ब्रह्मवादिनी थी और स्त्रियों को सदाचार की शिक्षा देती थी। इनका सिद्धान्त था कि स्त्रियाँ भी वेद और शास्त्रों के अध्ययन में निपुणता प्राप्त करें। और पुरुषों से यह बात कहती थी कि हम स्त्रियों पुरुषों को अघर्ष में नहीं पसीटतीं। इसलिये हम निर्दोष अवलाओं का चरित्र मत भ्रष्ट करो। हमारे प्रति बड़ी सदाचार का व्यवहार करो, जो कि वेदों में शिक्षा गया है। इस प्रकार से व्यवहारियों को दोकती थीं।
देवी यमी—इन्होंने भी वेद की ब्रह्मचर्य रची है। ये जनता को यम-नियम के पालन करने की शिक्षा देती थी। इनका कहना