ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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आज्ञा दी गई है अर्थात् १५ वर्ष की आयु से पहले किसी ने भी कन्या के विवाह का समर्थन नहीं किया है।
ऋग्वेद में कन्या के विवाह के सम्बन्ध में एक प्रार्थना यह है कि हे अश्विनी कुमार ! आप ऐसी दया कीजिये जब कि एक कन्या ब्रह्मवादिनी और ब्रह्मचारिणी रह कर, स्त्री के सब लक्षणों से युक्त हो जाय और वह सौभाग्यशालिनी अपना विवाह करना चाहे तब उसे तेजस्वी, सुन्दर और युवक बन मिले। वह बन पुरुषार्थी हो। उसके घर में स्नेह, माधुर्य तथा सौन्दर्य आदि का वास हो। विविध प्रकार के अन्न और धन से परिपूर्ण हो। जहाँ दया, दान और परोपकार आदि गुणों का बाहुल्य हो और योगादि से रहित हो। अर्थात् उस स्त्री को सर्वगुणसम्पन्न युवावस्था को प्राप्त बन मिले।
विवाह का अभिप्राय पाठकों को पहले विदित ही हो चुका है। इसलिये जब तक वर-कन्या अयोग्य और ज्ञानहीन हैं, तब तक उनका विवाह करना परम मूर्खता और अनुचित पाप है।
४—ब्रह्मचारिणी देवियों
यादगुण्येन भर्जा स्त्री, संयुज्येत यथाविधि। तदगुण्या सा भवति, समुद्रयेन निक्षग्ना ॥ (मनुस्मृति)
स्त्री जैसे पति के साथ संयुक्त होती है, वैसे ही उसमें गुण आ जाते हैं। जैसे नदी समुद्र से मिलते ही उसके खारेपन को ग्रहण कर लेती है।
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ब्रह्मचारिणी देवियोंँ
आत्मानमात्मना यास्तु, रक्ष्युस्ताः सुरक्षिताः ।
( मनुस्मृति )
जो स्त्री स्वयं ही अपने सतीत्व की रक्षा करती है, वही सुरक्षित रह सकती है ।
पत्नी के लिये पति ही ब्रह्म है । उसके साथ नियमानुकूल आचरण करना ही ब्रह्मचर्य है । प्राचीन समय में इस हिन्दूजाति में अनेक सच्ची ब्रह्मचारिणी तथा सती देवियाँ हुई हैं । पुराणों तथा अन्य कथा-प्रधान ग्रन्थों में उनके दिव्य-चरित्रों का वर्णन मिलता है । यहाँ हम कुछ की संक्षिप्त कथायें लिखते हैं । आशा है हमारी पाठिकायें भी उनका अनुकरण कर लाभ उठावंगी ।
ब्रह्मवादिनी घोषा—यह कश्चिदान सुनि की कन्या और वपिज की पौत्री थीं । ऋग्वेद के दशम मण्डल के ३९,४० सूक्त इन्हीं पर श्रफट हुए थे । इन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया था और इसका उपदेश भी सबको करती थीं । इनके सिद्धान्तों का सार नीचे दिया जाता है—
जो पुरुष स्त्री की प्राण-रक्षा में तत्पर रहे, उसे यज्ञ-कार्य में नियुक्त करे, उस पर प्रगाढ़ प्रेम रखे, उससे उत्तम सन्तान उत्पन्न करे, पितृयज्ञ के योग्य बनावे इन गुणों वाला वर ब्रह्मचारिणी को प्राप्त हो । ऐसे ही पति के मिलने से स्त्रियों को सुख होता है ।
युवक स्वामी और युवती स्त्री के सहवास से जो आनन्द प्राप्त होता है उसे ब्रह्मचारिणी कन्यायें कुछ भी नहीं जान सकतीं । हे अविनी-कुमार ! वह विषय हमें समझोने, अब हम स्त्री पर प्रेम रखनेवाले बलवान् और वीर्यवान् पति के घर जाना चाहती हैं ।
ब्रह्मचर्य-विद्यान
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ब्रह्मवादिनी सूर्या—यह ब्रह्मवेद के दशम मण्डल के ८५ सूक्त की रचयित्री हुई है। यह सूक्त विवाह सम्बन्ध में वर्णित है। उनके उपदेशों का सार नीचे दिया जाता है:—
हे बहू! तेरे पति के घर में ऐसी बरघुर्ष प्राप्ति हो, जो प्रजा तथा लुम्के भिय लेंगे। इस गृह में तू स्वामिनी बनने के लिये जागृत हो! इस पति के साथ संसर्ग कर और अज्ञात परमात्मा को ध्यान में रख कर, दोनों बुद्धावस्था तक परस्पर जुलभोग कर ले रही।
हे परमात्मन, तू इस बधू को सुपुत्रवती और सौभाग्यवती बनाना। इसके गर्भ से १० सन्तान उत्पन्न करना और ग्यारहवें इसके पति को जीवित रखना। हे बहू, तू अपने सद्गुणवहार से ससुराल पर अधिकार जमाना, सास-ससुर को सेवा-शुश्रूषा से वश में रखना, ननदों पर राज्य करना और देवों पर महारानी की भौंति शासन करना।
ब्रह्मचारिणी गोधा—यह ब्रह्मचारिणी और ब्रह्मवादिनी थी और स्त्रियों को सदाचार की शिक्षा देती थी। इनका सिद्धान्त था कि स्त्रियाँ भी वेद और शास्त्रों के अध्ययन में निपुणता प्राप्त करें। और पुरुषों से यह बात कहती थी कि हम स्त्रियों पुरुषों को अघर्ष में नहीं पसीटतीं। इसलिये हम निर्दोष अवलाओं का चरित्र मत भ्रष्ट करो। हमारे प्रति बड़ी सदाचार का व्यवहार करो, जो कि वेदों में शिक्षा गया है। इस प्रकार से व्यवहारियों को दोकती थीं।
देवी यमी—इन्होंने भी वेद की ब्रह्मचर्य रची है। ये जनता को यम-नियम के पालन करने की शिक्षा देती थी। इनका कहना
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ब्रह्मचारिणी देवियाँ
या कि धार्मिक पुरुषों और विद्वान् तथा गुणियों के आदर्श-चरित्र का अनुकरण करना चाहिये।
ब्रह्मचरिणी अम्बा—इनकी रची हुई ऋग्वेद में ५ ऋचायें हैं। जिनमें अम्बा की महत्ता गायी गई है। इससे यह सूचित होता है कि इनका सिद्धान्त था कि अम्बा से ही मनुष्यजाति का कल्याण हो सकता है।
सती सावित्री—सत्यवान् की पत्नी थीं। विवाह से पूर्व ही नारद जी ने उनके पिता से कहा कि जिनसे आप इसका विवाह करनेवाले हैं, वह थोड़े ही दिन जीयेगा। यह सुन कर उनके पिता ने दूसरे से उसका विवाह करना चाहा। पर ब्रह्मचारिणी सावित्री ने उन्हें ऐसा करने से रोका। अन्त में उनके हठ से उनका विवाह सत्यवान् से हो गया। कुछ दिनों में वन में उनका देहान्त हो गया। यमराज उसे लेने आये पर इस पतिव्रता ने प्ररनोत्तर से उनके भी झुके छुड़ा दिये। अन्त में हार मान कर इनके पति को जिलाना पड़ा।
देवी दमयन्ती—यह राजा नल की स्त्री थीं। इन्होंने स्वयं इनके साथ स्वयंवर स्वीकार किया। राजा नल अपना सारा राज्य-पाट जुट्टे में हार गये। वन में ले जाकर इन्होंने पतिव्रता दमयन्ती को बड़ी बुरी दशा में छोड़ दिया और आप भाग गये। पर ये किसी प्रकार अपने पिता के घर पहुँचीं और मिथ्या स्वयंवर की बात रच कर पुनः नल से मिलीं। इतना होने पर भी उसने अपने प्यारे पति का प्रगाढ़ प्रेम नहीं छोड़ा।
सती सुलोचना—यह लक्ष्मीराज रावण के महावली पुत्र मेघनाद की पत्नि थीं। श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण ने संभ्रम में
ब्रह्मचर्य विज्ञान
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उसे मार डाला था। उसकी एक मुजा जाकर सुलोचना के आगे गिरी। उसे सन्देह हुआ। अतएव उन्होंने कहा कि यदि मैं मन वचन तथा कर्म से पतिव्रता होऊँ तो यह मुजा मेरे अंचल पर लिखे कि मैं तेरा पति हूँ तभी मेरे मन में विश्वास होगा कि मेरे पति मारे गये।
पेसा ही हुआ। उस मुजा ने यही बात लिख दी। फिर वे सब के समझाने दुमाने पर भी न रुकीं और अपने पतिका शीश श्रीरामचन्द्र के यहाँ से लेकर अभि-चित्ता में सती हो गईं।
सतों माझी—ये महाराज पाण्डु की पत्नी थीं। इन्होंने बहुत दिनों तक अपने पति की रक्षा के लिये ब्रह्मचर्य का पालन किया था। ये भी अपने पति के मरने पर पुत्रों को कुन्ती के अधिकार में रख पति के साथ सती हो गईं।
सती सुदक्षिणा—यह समाहृ दिलीप की भार्या थीं। इन्होंने बहुत दिनों तक ब्रह्मचर्य से रह कर पुत्र के लिये महर्षि वशिष्ठ की गो की सेवा की थी।
अभी अधिक दिन नहीं हुये कि यवनों के शासन-काल में हमारे देश की अनेक पतिव्रता और ब्रह्मचारिणी स्त्रियों ने धर्म के लिए अपने प्राण अग्निदेव को समर्पित किये थे।
सती सुकन्या—यह महर्षि च्यवन की पत्नी थीं। इनके पिता एक दिन वन में अहेर खेलने गये थे। वहाँ च्यवन ऋषि तपस्या कर रहे थे। इस बालिका ने अम वश उनक दोनों नेत्रों में काँटे गोद दिये। यह खबर उनके पिता को लगी। उन्होंने ने अपनी पुत्री को महर्षि की सेवा के लिये समर्पित कर दी। कुछ दिनों के उपरान्त सुकन्या युवती हुई, पर अपने पति की सेवा करतीं।
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ब्रह्मचारिणी देवियर्
रही; अधिनी कुमार्ग ने इसे अपने वश में करने के अनेकों प्रलोभन दिये, किन्तु इसका मन ब्रह्मचर्य से जरा भी न छिगा। अन्त में उन्होंने प्रसन्न हो कर क्यवन को अपने औपधोपचार से अत्यन्त सुन्दर युवक बना दिया।
कुछ लोगों का कहना है कि ब्रह्मचर्य-पालन का अधिकार केवल पुरुषों के ही लिये है, स्त्रियों के लिये नहीं। यह उनका निरा बाल-वाद है। परमात्मा ने पुरुष-स्त्री दोनों को एक ही गर्भ से उत्पन्न किया है। उन दोनों के जीवन का लक्ष्य भी एक ही बनाया है। दोनों को अपने शारीरिक, नैतिक और मानसिक विकास का समान अधिकार है, जो ब्रह्मचर्य से ही सिद्ध हो सकता है। फिर एक ही को क्यों ऐसा अधिकार मिलने लगा? स्त्रियों को ब्रह्मचर्य-पालन का अधिकार न देना, सभी दृष्टियों से घोर अन्याय और जघन्य पक्षपात ही समझा जायगा।
वपुता और धारिणी—श्रीमद्भागवत में लिखा है कि वपुता और धारिणी नाम की दो स्त्रियाँ थीं, जिन्हें ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने की इच्छा हुई थी। इसलिये दोनों ने अपने को विवाह-बन्धनों से मुक्त रख कर अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया और अन्त में उनको मोक्ष प्राप्त हुआ।
प्राचीन समय में कुछ ऐसी आदर्श स्त्रियाँ भी हो गई हैं, जिन्होंने लौकिक सुख को तुच्छ समझ कर, अपना जीवन अविवाहित व्यतीत किया है। इससे यह बात सिद्ध होती है कि समाज के कल्याण तथा स्वात्मानन्द के लिये स्त्रियाँ भी अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन कर सकती हैं।
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मनुस्मृत्य-विज्ञान
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५—पातिव्रत आर ब्रह्मचर्य
“कोकिलानां स्त्रो रूपं, स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम् ।”
( वाणक्य-नीति )
कोयल का रूप उसका स्वर और स्त्रियों का सौन्दर्य उनका ‘पतिव्रत’ होता है ।
“व्यभिचारान्तु मनुः स्त्री, लोके प्रामोति निन्द्याताम् ।”
( मनुस्मृति )
अपने पति को छोड़ कर पर पुरुष को चाहने वाली स्त्री संसार में निन्दित होती है । अर्थात् व्यभिचारिणी कहलाती है ।
स्त्री पुरुष की अधोक्ति होती है । अतएव पति के हित में तत्पर रहना ही उसका सनातन धर्म है । जो स्त्री अपने पति का आदर करती है तथा मन, वचन और कर्म से उसकी आज्ञा का पालन करती है, वही स्वर्ग-सुख पाती है । पति के सर्वथा अखु-कूल रहना तथा स्वप्न में भी पर पुरुष की इच्छा न करने को ‘पातिव्रत’ कहते हैं । इस देश में प्राचीन काल में अनेक पतिव्रता स्त्रियाँ हो गई हैं, जिनकी कीर्ति आज भी भूमण्डल में व्याप्त है । इस बाल का साक्षी भारतीय इतिहास है कि जितनी सती साध्वी स्त्रियाँ हिन्दू-जाति में हुईं, उतनी कहीं सुनने में भी न आ सकीं ।
ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यास के पश्चात् कन्या का विवाह उसके सहरा ब्रह्मचारी और विद्वान-वर से होता है । सब से बहु अपने पति के अधिकार में रहती है । गुह्यशास्त्र में प्रशिक्षित होते ही उसको ‘पातिव्रत’ के पालन का सब से बड़ा तप उपस्थित होता
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महिलाओं का महत्त्व
है। यदि वह इसका पूर्ण-रूप से पालन कर सकी, तो वह स्त्री संसार में देवी का स्थान ग्रहण करती है।
हमारे विचार से पातिव्रत भी स्त्रियों के लिये एक प्रकार का गार्हस्थ्य 'ब्रह्मचर्य' है। इसमें भी प्रायः बहुत साधना की आवश्यकता होती है। अपने पति के साथ भी शास्त्र की मर्यादा का उल्लंघन करना न्यमिचार है। गृहस्थ स्त्रियों के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि वे इस आवश्यक ब्रह्मचर्य का पालन कर गृहस्थाश्रम को सुखमय बनाती रहें।
६—महिलाओं का महत्त्व
“स्त्री दिव्या शोभते गृहे ।”
( चाणक्य-नीति )
दिव्य ( गुणों वाली ) स्त्री घर में शोभित होती है।
हिन्दू-धर्म के इतिहास में देवियों के अनेक पवित्र चरित्रों का वर्णन आया है। प्रायः जिसने प्राचीन ऋषि-महार्षि ग्रन्थकार हुये हैं, सवों ने स्त्रियों के गौरव की कुछ न कुछ अवश्य प्रशंसा की है। स्त्री प्रधानतया प्रकृति की शक्ति है। इसके बिना सृष्टि-रचना असम्भव है। इसी से मनुस्मृति में लिखा है कि ब्रह्माजी ने प्रारम्भ में अपने शरीर के दो टुकड़े किये। एक भाग से पुरुष और दूसरे से स्त्री की रचना की।
वैदिक काल स्त्रियों के लिये स्वर्ण-युग था। उस समय ये आज कल की भाँति हीन नहीं थीं। बहुत से उदाहरणों से यह ज्ञात होता
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है कि स्त्री-जाति के अधिकार बहुत ही न्याय-संगत थे । उस समय ये वैदिक संस्कारों की अधिकारिणी थीं । यही कारण था कि घोषा, सूर्या, विश्ववरा, लोपासुरा तथा इन्द्राणी आदि जैसी विदुषी देवियाँ सन्तों की दर्शिका हुईं । उनका उल्लेख आज भी मंत्रों के साथ मिलता है । अब इससे घट्ट कर स्त्रियों की उन्नति और क्या हो सकती है !
अब हम महिलाओं के मूल महत्त्व, उपकार तथा सदगुणों के सम्बन्ध में लिखेंगे। प्रयासा-वाक्य महाभारत और मानव-धर्म-शास्त्र से उद्धृत करते हैं:—
अर्धं भार्यां मनुष्यस्य, भार्याश्रेष्ठतमः सखा ।
भार्यां मूलं जिवगंस्य, भार्यां मूलं तरिष्यतः ॥
पत्नी पुरुष की अर्धाङ्गिनी होती है—भार्या मनुष्य का सर्वोत्तम मित्र है—भार्या त्रिवर्ग ( धर्म, अर्थ और काम ) का कारण है और भार्या मोक्ष का भी साधन है ।
भार्यावन्तः क्रियावन्तः; सभायां क्रियमेधिनः ।
भार्यावन्तः प्रमोदन्ते, भार्यावन्तः श्रियान्विताः ॥
स्त्री वाले क्रियावान् हैं—स्त्री वाले गृहस्थ-धर्मी हैं—भार्या वाले प्रसन्न रहते हैं और स्त्री-युक्त ही धनवान् हैं ।
सखायः प्रविक्लिप्तेषु, भवन्नेयतः प्रियवदः ।
पितरौ धर्मकार्येषु, भवत्याचारस्य मातरः ॥
स्त्रियाँ एकान्त में मित्र, धर्म-कार्य में पितर और दुरवस्था में माता की भाँति प्रसन्नता, सहायता एवं सेवा करती हैं ।
क्रियान्तु रोचमानायां, सर्वतद्रोचते कुलम् ।
तस्मां त्वरोचमानायां, सर्वमेव न रोचते ॥
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महिलाओं का महत्त्व
स्त्री की प्रसन्नता में सब की प्रसन्नता है। यदि वह घर में अभ्यसन्न हो, तो कुछ भी नहीं अच्छा लगता।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वास्तत्रा फलाः क्रियाः ॥
जहाँ स्त्रियों का आदर होता है, वहाँ देवगण निर्वास करते हैं। और जहाँ इनका निरादर होता है, वहाँ सारे कार्य निष्फल हो जाते हैं।
शोचन्ति जामयां यत्र, विनश्यत्याशु तत्कलम्। न शोचन्ति तु यत्रैताः, चर्द्वन्ते तदुधि सर्वदा ॥
जिन घरों में स्त्रियाँ कष्ट पाती हैं, वे शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। और जिस कुल में ये सुख पाती हैं, वे सदैव उत्पति करते हैं।
सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता, भर्त्रा भार्या तथैवच। यस्मिन्नेव कुले नित्यं, कल्याणं तत्र वै ध्रुवम् ॥
जिस कुल में पत्नी से पति सन्तुष्ट रहता है और उसी भाँति पति से पत्नी सदैव प्रसन्न रहती है, उस कुल में कल्याण होमा निश्चित है।
मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते, धान्यं यत्र सुसञ्चितम्। द्वामपत्य-कलहो नास्ति, तत्र श्रीः स्वयमागता ॥
( चाणक्यनीति )
जिस गृह में मूर्खों का आदर नहीं होता—जहाँ अन्न सम्भित रहता है और जहाँ पति-पत्नी में कलह नहीं रहता, वहाँ लक्ष्मी स्वयं आती है।
पृथिव्यां यानि तीर्थानि, सतीपादेषु तान्यपि। तेजस्त्रा सर्वदेवानां, मुनीनाञ्च सतीषु च ॥
ब्रह्मचर्य-विधान
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सतीनां पादरजसा, सद्यः पूता वसुन्धरा ।
पतिव्रतां नमस्कृत्य, मुच्यते पायकाश्रयः ॥
संसार में जितने तीर्थ हैं, सब सती स्त्रियों के चरणों में हैं, सब देवताओं और मुनियों का तेज पतिव्रताओं में होता है । सती स्त्रियों की चरण-मूलि से तत्काल प्रथवी पवित्र हो जाती है । पतिव्रताओं की वन्दना करके मनुष्य पातक से छूट जाता है ।
७—आदर्श माता
“नास्ति मातुलमो गुरुः ।”
माता के समान बालक का संसार में दूसरा गुरु नहीं ।
यह बात बहुत सत्य है कि जैसी माता होती है, वैसी ही उसकी सन्तान भी होती है । प्रत्येक सन्तान पर उसकी माता के भले-पुरे गुणों का अवश्य प्रभाव पड़ता है । हमारी इस बात का समर्थन सुश्रुत और वाग्भट जैसे ऋषि-प्रणीत वैद्यक शास्त्रों में किया गया है । देखिये, धर्माचार्य मनु माता के सन्वन्ध में अपनी यह सम्मति देते हैं:—
उपाध्यायानन्दशाचार्य, आचार्यार्णो शतं पिता ।
सहस्रान्तु पितृग्माता, गौरवेणासि रिच्यते ॥
१० उपाध्याय के बराबर १ आचार्य, १०० आचार्य के बराबर १ पिता और १००० पिता के बराबर माता गौरव में बड़ी है ।
बालक-बालिकाओं पर उपाध्याय, आचार्य और पिता का उत्तम प्रभाव कदापि नहीं पड़ता, जितनाकि साता का प्रभाव पड़ता
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आदर्श माता
है। एक सुराश्रिता माता अपनी सन्तान को थोड़े ही दिनों में सब गुणों से सम्पन्न कर देती है।
माता का पद वास्तव में बड़े महत्व और उत्तरदायित्व का है। यदि माता अयोग्य हुई, तो सन्तान किसी काम की नहीं हो सकता। सन्तान के लिये माता की योग्यता की परम आवश्यकता होती है।
आजकल की दशा बड़ी विचित्र है। सामाजिक अवनति के कारण प्रायः अयोग्य बालिकायें माता-पद पर सुरोभित हो रही हैं। जब वे स्वयं ही संसार का कुछ अनुभव नहीं रखतीं तब भला वे अपनी सन्तान का क्या उचित प्रकार से लालन-पालन कर सकेंगी? ऐसी अवस्था में, गुणहीन, क्रूर, निर्बल, और निस्तेज सन्तान निकले, तो फिर आश्चर्य ही क्या है ?
महाभारत में युधिष्ठिर-मार्कण्डेय-संवाद है। उसमें युधिष्ठिर के पूछने पर मार्कण्डेयजीने इस प्रकार माता का महत्व वर्णलाया है:-
मातृस्तु गौरवाद्भ्ये, पितृनभ्ये तु मेनिरे ।
दुष्करं कुरुते माता, विवर्धयति वा प्रजाः ॥
किसी का मत है कि माता बड़ी है, और किसी के विचार में पिता बड़ा है। पर मैं कहता हूँ कि माता ही बड़ी है। क्योंकि वह सन्तान को पाल-पोस कर बड़ा करने का कठिन कार्य करती है।
आज तक जितने शूरवीर, विद्वान्, कीर्तिमान्, तेजस्वी और प्रतापी पुरुष हुए हैं, वे सब अपनी सदाचारिणी, पतिव्रता तथा सुयोग्य माता के द्वारा ही हुये हैं।
माता के लिये त्रज्ञाचारिणी होना अत्यन्त आवश्यक है।
ब्रह्मचर्य-विदान
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व्यभिचारिणी होने से सन्तान भी वैसी ही उत्पन्न होती है। माता के आचरण का गर्भस्थ बालक पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। शुक्रदेव तथा अभिमन्यु जैसे परम शान्ती एवं अद्वितीय वीर बालकों को माता के गर्भ में ही आत्मज्ञान एवं शास्त्र-सम्बालन की शिक्षा मिली थी। गर्भ-धारण करते ही माता को ब्रह्मचर्य सम्बन्धी सब नियमों का पालन करना चाहिये। प्रसूचारिणी, सुरलीला एवं विदुषी स्त्रियों की सन्तान भी उसकी भाँति सब गुणों में दृढ़ होती है।
८—ब्रह्मचर्य-युक्त गर्भाधान
“हर्मा त्वमिन्द्र मीदृषः सुपुत्रां सुभर्गां कृणु ।”
(ऋग्वेद)
हे वीर्य से परम ऐश्वर्यवान् पुरुष ! तू इस पत्नी को उत्तम पुत्रोंवाली और सौभाग्यवाली बना।
“प्रजनाथं स्त्रियः स्मृधाः, सन्तानार्थञ्च मानवम् ।”
(महुरथवि)
गर्भ धारण करने के लिये स्त्रियों और गर्भाधान करने के लिये पुरुषों की रचना हुई है।
प्रायः सभी महर्षियों ने स्त्रियों का उद्देश्य सन्तानोत्पत्ति माना है। यह कार्य वास्तव में बड़े महत्त्व और दायित्व का है। यही कारण है कि गर्भाधान की गणना पौष्ट्य संस्कारों में की गई है। शास्त्रकारों का मत है कि गर्भाधान ब्रह्मचर्य युक्त होना चाहिये। पर आज कल इस पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया जाता। यही
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ब्रह्मचर्ये युक्त गर्भो धान
कारण है कि उत्तम पुत्र-पुत्रियों का अभाव हो रहा है। अयोग्य माता-पिता की सन्तान कैसे अच्छी हो सकती है। जिस अवस्था में इस कार्य का विधान है, उसकी कोई चिन्ता ही नहीं है।
गर्भोधान के लिये अवस्था नियत की गई है। १६ वर्ष से पहले की को गर्भधारण न करना चाहिये, और २५ वर्ष से पहले पुरुष को गर्भोधान करना मना है। इस नियम के विपरीत चलने से जो जो हानियाँ होती हैं, वे इस प्रकार वैद्यक-प्रश्न में वर्णित हैं:—
ऊन षोडश वर्षायाम्, प्राप्तः पञ्चविंशतिभू । यद्याघते पुमान् गर्भं, कृत्विस्थः स विपद्यते ॥
यदि १६ वर्ष से कम आयुवाली की में २५ वर्ष से न्यून वयवाला पुरुष गर्भोधान करे, तो वह गर्भ उदर में ही विपत्ति को प्राप्त होता है।
जातो घा न विरञ्जीवेज्जीवेद्वा दुर्बलेन्द्रियः । तस्मादत्यन्त बालायां, गर्भोधानंन कारयेत् ॥
(छत्तुत-श्रेहिता)
यदि उस गर्भ से सन्तान उत्पन्न भी हुई, तो वह जीती नहीं। यदि जीती है तो अत्यन्त दुर्बल अङ्गोवाली होती है। इसलिये कम आयुवाली की में कभी गर्भोधान न करना चाहिये।
पूर्ण युवती की को चाहिये कि मासिक धर्म से शुद्ध होकर अपने स्वस्थ तथा युवक पति से एक बार समागम करे और गर्भ के लक्षण सूचित होने पर, जब तक बालक उत्पन्न होकर, दूध पीना न छोड़ दे, तब तक पुरुष से सम्बन्ध न करे। अर्थात् २१, ३ वर्षों के पश्चात् पुनः गर्भोधान का समय आता है, और इस
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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विधि से अधिक से अधिक १० पुत्र-पुत्रियाँ उत्पन्न कर लेने पर, पुनः ब्रह्मचर्य से रह कर सौ वर्ष तक जीवे। यह आशा हमारे सर्व-प्रधान ग्रन्थ वेद में भी दी गई है। जो स्त्री-पुरुष इस वैदिक नियम का पालन करते हैं, वे सदैव स्वस्थ और नींदोग रहते हैं। उनका आयु-वर्ल कदापि क्षीण नहीं होता और वे एक बार के सम्भोग से ही गर्भाधान कर सकते हैं। इस बात के उदाहरण हमारे पूर्वज ऋषियों के इतिहास हैं।
प्रत्येक स्त्री को पृथ्वी के गुफों का अनुकरण करना चाहिये। तत्व के धारण, उत्पादन और पोषण की, जो शक्ति पृथ्वी में है, वह स्त्री में भी है। जैसे वह संयम से रह कर वीन धारण करती है, और उसे अङ्कुर के रूप में प्रकट करती है, वैसे ही स्त्री को भी ब्रह्मचर्य का पालन कर गर्भ-धारण करके, उससे सन्तान उत्पन्न करना चाहिये। जैसे वह उस अङ्कुर का पोषण कर उसे संन्य बनाने देती है, वैसे ही इसे भी अपनी सन्तान को पाल कर योग्य बनाना चाहिये।
प्रत्येक पुरुष को मेघ के गुफों का अनुकरण करना चाहिये। उत्पादन-शक्ति जो उसमें है वह उसमें भी है। जैसे मेघ उचित समय पर पृथ्वी को जल से सींचता है, उसी प्रकार पुरुष को भी नियम से गर्भाधान करके योग्य है।
६—अखण्ड ब्रह्मचारिणी सरस्वती
“सरस्वती वाङ्महती महोपताम्।”
सरस्वती विद्या की महती देवी है, जिसकी महिमा अपार है।
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ब्रह्मचारिणी सरस्वती
“वन्देतां परमेश्वरीं भगवतीं, बुद्धिभदां शारदाम् ।” ( श्लोक )
उस परमात्मस्वरूपा, ऐश्वर्यवती तथा बुद्धि-दायिनी शारदा को हम ( ब्रह्मा सहित ) नमस्कार करते हैं ।
सरस्वती का नाम संसार में बहुत ही विख्यात है । इन्हें लोग विद्या की देवी मानते हैं । इसी विचार से आज अस्सल्य लोग इनकी पूजा करते हैं ।
जिन लोगों के हृदय में विद्वान और ज्ञानवान बनने की अभिलाषा रहती है, वे तो प्रायः निरन्तर इस बड़ी शक्ति की मन, चक्षु तथा कर्म से आराधना करते हैं । इन्हें सब देवियों में इतनी प्रतिष्ठा और महानता क्यों मिली ? यह बात बहुत कम लोगों को ज्ञात है । अतः हम उसे बताना चाहते हैं ।
सरस्वती देवी विद्या की प्रधान प्रेरिका और रक्षिणी हैं । यह अधिकार इनको ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन और वेदाध्ययन से प्राप्त हुआ है । इस प्रकार तो पुराणों के मत से ये ब्रह्माजी की पुत्री हैं । इन्होंने कभी अपना विवाह ही नहीं किया । इन्हें ज्ञान और विद्वान से इतना प्रेम हो गया था कि ये जीवन पर्यन्त भखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करती रहीं । कई बार इनकी परीक्षा ली गई, पर ये तिल भर भी अपने व्रत से नहीं डिगीं । विवाह न करने का एक कारण यह भी था कि इन्होंने अपने सहरा एक भी वर नहीं देखा । इनके दीर्घ ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यास से प्रसन्न हो कर सब देव-नरपंडित इनको माता समझने लगे । इनके पिता ब्रह्मा ने इन्हें वेद की अधिष्ठात्री बना दी । तब से आज तक ये उसी अवस्था में पूजित हो रही हैं । ये ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यास से
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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बहुत प्रसन्न रहती हैं। जो कन्या इनको प्रसन्न करना चाहती हो, वह अवश्य ब्रह्मचर्य से रह कर विद्याभ्यास में लगी रहे।
१०—वेदवती का अपूर्व ब्रह्मचर्य
“किन्नामोति रमारूपा, ब्रह्मचर्य-तपस्विनी।”
ब्रह्मचर्य-तप की तपस्विनी लक्ष्मी-रूपिणी की को संसार में कुछ भी दुःखभ नहीं है।
प्राचीन समय में अक्षरशः ब्रह्मचर्य के प्रेमी न केवल पुरुष ही थे, वरन् कई स्त्रियाँ भी ऐसी हुई हैं, जिन्होंने ब्रह्मचर्य के लिये अपना अमूल्य जीवन समर्पित किया था। क्या पुरुष क्या स्त्री, जिस किसी को ब्रह्मचर्य का मधुर फल चखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, वही इस पर सुख हो गया है। इस बात को हम एक पौराणिक आख्यायिका द्वारा दिखलाना चाहते हैं:—
वेदवती नाम की एक ऋषिकन्या थी जो अत्यन्त सुन्दरी तथा सुशीला थी। वह पूर्ण युवती हो गई थी, पर जब भी उसका विवाह नहीं हुआ था। वह एक वन की पर्ण-कुटी में रह कर निरन्तर सपस्या करती थी। उसकी इच्छा भी विवाह करने की न थी। कारण यह था कि उसका मन ब्रह्मचर्य के पालन से बहुत शुद्ध और दृढ़ हो गया था।
एक दिन की बात है कि राजाओं का राजा रावण उसी मार्ग से आ निकला। उसकी दृष्टि वेदवती पर पड़ी। वह उसे देखते ही मोहित हो गया। उसने नाना प्रकार के प्रलोभनों में उसे
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वेदवृत्ती का अपूर्व ब्रह्मचर्य
फाँसना चाह्ता, पर उस ब्रह्मचारिणी का मन तिल भर भी न डिंग सका। रामचरितमानस में बहुत सत्य लिखा है:—
डनै न शम्भु शरासन कैसे। फामी-चचन सती-मन जैसे॥
अन्त में रावणने हार मान कर उसे बलात् अप्रुठ करना चाह्ता। उसने उसके लम्बे-लम्बे काले-काले केशों को पकड़ कर खँचना प्रारम्भ किया। इस पर उस परम तेजस्विनी महिला ने रावण को इस प्रकार मट्क दिया कि वह दूर जा गिरा। फिर वेदवती ने कहा—रे दुष्ट पापात्मा! तुने मेरे केशों का स्पर्श कर लिया। इस लिये पर पुरुष के छू जाने से मेरा ब्रह्मचर्य-व्रत खण्डित हो गया। अब मैं अपना कलुषित कलेश्वर किसी प्रकार नहीं रख सकती। ले देख ! मैं अभी इसका प्रायश्चित्त किये देती हूँ।
यह कह कर वह वहीं एक जलते हुये अग्नि-कुण्ड में कूद पड़ी और साक्षात् ब्रह्म-लोक में जा पहुँची। अन्यायी रावण हाथ मल कर रह गया।
धन्य है सती-शिरोमण्ये ! धन्य है ! अवश्य ही तुने अपूर्व ब्रह्मचर्य का परिचय दिया। तेरे पवित्र चरित्र तथा अदम्य आत्म-बल की कथा भारत की स्त्री-जाति के इतिहास में “शाबरुच्चन्द्रदिवाकरे” सुवर्णचूर्नों में लिखी रहेगी।
हमारी पाठिकाओं को इस ब्रह्मचारिणी के आदर्श चरित्र तथा मनोबल से शिखा लेनी चाहिये।
अक्षचर्य-विज्ञान
२३०
११—सर्वोच्च ब्रह्मचारिणी सीता
“सीता सर्वगुणोपेता, चार्या पतिपरायणा ।”
(सूक्ति)
सीता सब गुणों से भूषित और श्रेष्ठ पति (राम) की सेवा करनेवाली थीं ।
जैसे श्रीराम एक पत्नी-व्रत गृहस्थ ब्रह्मचारी थे, वैसी ही सीता भी पतिपरायणा आदर्श-पतिव्रता-थीं। रामायण भर में सीता के चरित्र में कई प्रसङ्ग ऐसे आये हैं, जिनसे उनके मानसिक ब्रह्मचर्य, अद्वितीय पति-प्रेम, सत्यनिष्ठा और धर्म-पालन आदि अनेक गुण प्रकट होते हैं । यदि भारतवर्ष की स्त्रियों इनके चरित्र को पढ़कर अपना जीवन सुधारें, तो फिर कहना ही क्या है ।
अयोध्या में श्रीराम के वन-गमन के समय उन्होंने पति के साथ चलने का प्रबल अनुरोध किया, जो वर्णन के बाहर है । श्रीराम ने बहुत कुछ उपदेश दिया, पर पतिप्राणा सीता ने बड़ी नम्रता से उनका खण्डन किया, जो तुलसीकृत रामायण में देखने योग्य है ।
सीताजी ने बड़े विनयशील और नीतियुक्त वचनों में श्रीराम की बातों का खण्डन इस प्रकार किया:—
तत्तु धन धाम धरणि पुर राज् । पति विहीन सब शोक समाज् ॥ भोग योग-सम भूषण भारु । यम-यातना सरित संसारु ॥
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सर्वोच्च ब्रह्मचारिणी सीताः
प्राणनाथ ! तुम विन जगमाहीं । मो कहँ सुखद कतहुँ फोड नाहीं ॥
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जिय विनु देह नदी विनु वारी । वैसहि नाथ पुरुष विन नारी ॥
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खग भुग परिजन नगर वन, वलफल वसन दुकूल । नाथ साथ सुर-सदन सम, पर्याशाल सुख-मूल ॥
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पावँ पवारि वैठि तब-छाहीं । करिहौ वायु मुदित मन माहीं ॥
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को भभु सँग मोहि चितवन हारा । सिंह वधुहि जिमि शशक सियारा ॥ मैं सुकुमारि नाथ वन योग् । तुमहि उचित तप मो कहँ भोग् ॥
( तुलु- रामा )
चे बाते कह कर सीता पृथ्वी पर गिर पड़ीं । यह दशा देख कर राम ने विचारा कि यदि मैं जानकी को यहीं छोड़ जाऊँगा तो यह जीती न रहेगी । अतः उन्होंने अपने साथ चलने की आज्ञा दे दी ।
रावण के हृद ले जाने पर लक्ष्म की अशोक-वाटिका में तप- स्विनी वैध में सीताजी कई वर्षों तक पति के ध्यान में मग्न रहीं । पराये पुरुष की ओर देखना भी वे पाप समझती थीं ।
उन्होंने रावण को कैछा फटकाराः—