भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 221, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 221

मनुस्मृत्य-विज्ञान

२१८

५—पातिव्रत आर ब्रह्मचर्य

“कोकिलानां स्त्रो रूपं, स्त्रीणां रूपं पतिव्रतम् ।”

( वाणक्य-नीति )

कोयल का रूप उसका स्वर और स्त्रियों का सौन्दर्य उनका ‘पतिव्रत’ होता है ।

“व्यभिचारान्तु मनुः स्त्री, लोके प्रामोति निन्द्याताम् ।”

( मनुस्मृति )

अपने पति को छोड़ कर पर पुरुष को चाहने वाली स्त्री संसार में निन्दित होती है । अर्थात् व्यभिचारिणी कहलाती है ।

स्त्री पुरुष की अधोक्ति होती है । अतएव पति के हित में तत्पर रहना ही उसका सनातन धर्म है । जो स्त्री अपने पति का आदर करती है तथा मन, वचन और कर्म से उसकी आज्ञा का पालन करती है, वही स्वर्ग-सुख पाती है । पति के सर्वथा अखु-कूल रहना तथा स्वप्न में भी पर पुरुष की इच्छा न करने को ‘पातिव्रत’ कहते हैं । इस देश में प्राचीन काल में अनेक पतिव्रता स्त्रियाँ हो गई हैं, जिनकी कीर्ति आज भी भूमण्डल में व्याप्त है । इस बाल का साक्षी भारतीय इतिहास है कि जितनी सती साध्वी स्त्रियाँ हिन्दू-जाति में हुईं, उतनी कहीं सुनने में भी न आ सकीं ।

ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यास के पश्चात् कन्या का विवाह उसके सहरा ब्रह्मचारी और विद्वान-वर से होता है । सब से बहु अपने पति के अधिकार में रहती है । गुह्यशास्त्र में प्रशिक्षित होते ही उसको ‘पातिव्रत’ के पालन का सब से बड़ा तप उपस्थित होता

ब्रह्मचर्य विज्ञान · पृष्ठ 221, कुल 380 में से · BharatKosha